ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 26

श्रीकामिनीकुमार घोष

श्रीकामिनीकुमार घोष की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीकामिनीकुमार घोष
श्रीकामिनीकुमार घोष — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीकामिनीकुमार घोष का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

श्रीकामिनीकुमार घोषकी आयु १०० वर्षसे भी अधिक थी। जब लेखकने व्दावनमें श्रीगोपेश्वर महादेवके निकट उनके निवास स्थानपर उनके दर्शन किये। वे मकानकी दूसरी मन्जिलपर बरामदेमें दीवारके सहारे पद्मासनसे बैठे थे। उनके नेत्र अर्धमुद्रित थे, और भींगे-भींगेसे हाथमें माला-झोली थी। ओष्ठ ईषत हिल रहे थे। पर वे बाह्यज्ञान-शून्यसे लग रहे थे। उनकी पुत्री श्रीमती व्रजरंगिनी रायके कई बार

पश्चात् उनसे कुछ बातें हुई। पर, वे कुछ पूछनेपर केवल एक-दो शब्दोंमें उत्तर देते और चुप हो जाते। ऐसा लगता कि अन्तर्मगत्की कोई अनुभूति उन्हें बार-बार अपनी ओर खींच रही है। उन्हें प्रश्नोंका उत्तर देनेके लिए प्रयत्न करना पड़ रहा है। कभी-कभी वे कुछ कहना चाहते, पर कहते-कहते रुक जाते। वाक्य अधूरा-का-अधूरा रह जाता। उनका मौन ही उसे पूरा करता जान पड़ता, पर उनके भावसे लगता कि जैसे उन्हें वाक्यको अधूरा छोड़ देनेका भी पता नहीं है। उच्च स्वरसे 'राधेश्याम, पुकारनेपर उन्होनें नेत्र खोले। दण्डवत् प्रणामादिके

पुछनेपर ज्ञात हआ कि उस समय यह उनकी साधारण और सहज स्थिति थी।

वे श्रीकृष्ण-लीला-चिन्तनमें सदा डूबे रहते। साधारण साधकको जिस प्रकार मन और इन्द्रियोंको संसारके विषयोंसे खींचकर श्रीकृष्ण-रूप-गुण-लीलादिमें लगानेके लिए प्रयत्न करना पड़ता है, उसी प्रकार उन्हें मन और इन्द्रियोंको श्रीकृष्ण-रूप-गुण-लीलादिसे खींचकर बहिर्जगत्में लानेके लिए प्रयत्न करना पड़ता।

उनकी सिद्धावस्थाकी इस चरम स्थितिके मूलमें था उनका सदाचार और कतिपय सिद्ध-महात्माओंका संग, जो उन्हें भगवत्कृपासे उनके जीवनके प्रारम्भसे अन्त तक मिलता रहा।

उनके पिता श्रीगोविन्दमोहन घोष स्वयं परम भक्त थे। वे नओला ग्राम, जिला मैमसिंहके रहनेवाले थे। पर, उनके भक्ति-भावके कारण दूर-दूरके लोग उन्हें जानते थे और उनके प्रति विशेष श्रद्धा रखते थे। श्रीराधागिरिधारीकी उनके घरमें सेवा थी। साधु-वैष्णवोंका समागम और कथा-वार्ताओंका दौर-दौरा भी उनके यहाँ चलता ही रहता।

श्रीकामिनीकुमारपर इस सबका प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। उनके हृदयकी उर्वर भूमिपर भक्तिका बीजारोपण हुआ उनके घरमें ही। प्राथमिक शिक्षा घरपर प्राप्तकर जब वे कलकत्ते गये बी. ए. और कानूनकी परीक्षाएँ करने, तब उन्हें साधु-महात्माओंका संग करनेका विशेष अवसर मिला। वे उतना ही समय पढ़नेमें लगाते जितना इन परीक्षाओंको पास करनेके लिए आवश्यक होता। बाकी समय साधु-सन्तोंके सत्संगमें व्यतीत करते। अपने भक्ति-भावकी रक्षाके उद्देश्यसे सहपाठियों और अन्य लोगोंसे सम्बन्ध कम-से-कम रखते। अपना भोजन भी आप ही बनाते, जिससे दूसरे लोगोंके सम्पर्कमें न आना पड़े।

बी०बी० और लॉकी परीक्षाएँ पास करनेके पश्चात् माता-पिताने उनका विवाह कर देना चाहा। वे विवाह नहीं करना चाहते थे। माता-पिताकी इच्छाके

विरुद्ध कोई काम करना भी उनके स्वभावके अनुकूल न था। वे बड़े धर्म-संकटमें पड़ गये।

उनके बडे भाईके ससुर श्रीहरिसुन्दर भुञा (भौमिक) एक सिद्ध महात्मा थे। वे सदा भावाविष्ट रहते। राधारानीके चरणोंकी विस्मृति कभी न होने देते। उनका कामिनीबाबू गुरुके समान आदर करते। भजन-साधनके सम्बन्धमें कोई कठिनाई होती तो उन्हींसे परामर्श करते। जो वे कहते उसे स्वीकार करनेको बाध्य होते। विवाहके सम्बन्धमें भी उन्होंने उनसे परामर्श किया। उन्होंने उन्हें विवाहकर लेनेकी सलाह दी और कहा- 'देखो. विवाह करने या न करनेसे भक्तिका कोई सम्बन्ध नहीं। साधक विवाहित हो या अविवाहित वह सदा राधारानीकी दासी होनेका अभिमान रखे। यह समझे कि उसका संसार राधारानीका ही संसार है। जो भी कार्य करे उसे राधारानीका कार्य समझकर करे। ऐसा कोई भी कार्य न करे जिसमें उनका भावानुसारण या अनुमोदन न हो।

राधारानीकी कृपा लाभ करनेका यह सबसे सहज उपाय है।'

भुजाजीने कामिनीबाबूका भक्ति-भाव देख उन्हें एक ऐसी नौकरी दिला देना चाहा, जो उनके साधन-भजनके सर्वथा अनुकूल हो और जिससे उनके भक्ति-भावकी पुष्टि होती रहे। वे उन्हें ताराशके जमींदार राजर्षि बनमाली राय बहादुरके पास ले गये। बनमाली राय भुजा महाशयको अपना शिक्षा गुरु मानते थे। उनकी सिफारिशपर उन्होंने कामिनीबाबूकी अपने बच्चोंके शिक्षक (प्राइवेट ट्यूटर) के रूपमें नियुत्ति कर दी। इसके पश्चात् शीघ्र ही उनकी प्रतिभा और भक्ति-परायणतासे प्रभावित हो उन्होंने उनकी पदोन्नति पहले अपने प्राईवेट सेक्रेटरी और फिर अपनी रियासतके मैनेजरके रूपमें कर दी।

इसी बीच कामिनीबाबूका विवाह हुआ और वे एक आदर्श गृहस्थ भक्तके रूपमें राधारानीके संसारके संसारी होकर जीवन यापन करने लगे। तराशकी राधारानी बनवारी नगरमें जिस परिवेशमें वे रहते थे उसका प्रत्येक अंश उनके इस भावकी पुष्टि करता जान पडता था। राजर्षि बनमाली राय परम भक्त थे। वे अपने कुलदेवता 'विनोद-विनोदनी' (श्रीकृष्ण और श्रीराधा) की स्नान, शृंगार, भोग और आरती आदिकी सेवा अपने-आप करते। उन्हें भाँति-भाँतिसे लाड़ लड़ाते। उन्हें लेकर उनके यहाँ कोई-न-कोई उत्सव नित्य होता रहता। कथा, कीर्तन और साधु-संग भी विनोद-विनोदनीकी सेवाके अङ्गके रूपमें होते रहते। कामिनीबाबूका मुख्य कार्य था इन सब कार्योंमें उनकी सहायता करना। वे नौकर बनमाली रायके नहीं, विनोद-विनोदनीके थे।

लगे। उन्होंने वृन्दावन और राधाकुण्डमें दो विशाल भवनोंका निर्माण किया, जो कुछ दिनों बाद राजर्षि बनमाली राय विनोद-विनोदनीको लेकर बजमें रहने साथ वृन्दावनमें रहते, कभी राधाकुण्डमें। बनमाली रायके साथ कामिनीबाबूका भी 'तराश मन्दिर' और 'राजवाडी'के नामसे विख्यात है। वे कभी विनोद-विनोदनीके बजवास होने लगा।

भक्तिके प्रचार और साधू- वैष्णवोंकी सेवाके उद्देश्यसे श्रीबनमाली रायने वृन्दावनमें कई महत्त्वपूर्ण कार्य किये, जो कामिनीबाबूके अथक परिश्रम और उन कार्योंमें उनकी अपनी विशेष रुचिके कारण ही सम्पन्न हो सके। एक छापाखाना खोलकर चार लाख रुपयेकी लागतसे अष्ट-टीका सहित श्रीमद्भागवत और अन्य भक्ति ग्रन्थोंका मुद्रण कराया, जिनका नितान्त अभाव हो चला था। औषधालय चलाकर भजनानन्दी साधु-वैष्णवों और व्रजवासियोंकी चिकित्साकी व्यवस्था की। भक्ति-विद्यालयकी स्थापना कर छात्रोंके लिए छात्रवृत्तिकी और उन्हें शास्त्र पढानेकी व्यवस्था की।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

वृन्दावनमें विविध प्रकारसे साधु-वैष्णवोंकी सेवा करनेका अवसर तो मिला ही, भक्तश्रेष्ठ श्रीबनमाली रायके सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी होनेके कारण कामिनीबाबुको उनके भजन-साधनमें विशेष प्रगति भी हई। उन्होंने शृंगार-वटके श्रीपाद ब्रह्मानन्द गोस्वामी प्रभुसे मन्त्र-दीक्षा लेकर विधिवत् भक्ति-साधना आरम्भ कर दी। सत्संगकी उन्हें असमी सुविधाएँ मिलीं। उनका जीवन सत्संगमय हो गया। उस समय वृन्दावनमें जितने सिद्ध-महात्मा रहते थे, सबसे उनका अति निकटका सम्बन्ध हुआ। उनका मुख्य काम ही था उनसे सम्पर्क स्थापित कर राजर्षिजीको उनका संग उपलब्ध कराना।

इस प्रकार जिन महात्माओंकी विशेष कृपा उन्हें प्राप्त हुई उनमें से कुछ हैं-अद्वैतवंशके प्रभुपाद श्रीराधिकानाथ गोस्वामी, श्रीगौरकिशोर शिरोमणि, श्रीकृष्णदास बाबा, श्रीनित्यानन्ददास बाबा, पण्डित रामकृष्णदास बाबा, और श्रीजगदीशदास बाबा।

बँगालसे भी श्रीराधारमण चरणदास (बड़े बाबा), श्रीविजयकृष्ण गोस्वामी और प्रभुपाद प्राणगोपाल गोस्वामी आदि वृन्दावन आया करते। उन सबका संग उन्हें राजर्षिजीके कारण सहज ही उपलब्ध होता। जिस प्रेम-वस्तुको जीवन भरकी साधनासे भी प्राप्त करना सम्भव नहीं होता, उसके लिए इनका मार्ग इन महापुरुषोंके दिव्य संगके प्रभावसे धीरे-धीरे प्रशस्त होता गया।

उसमें छापा गया है। वह इस प्रकार है-जिस प्रकार इन महापुरुषोंके संगसे कामिनीबाबूकी आत्म शुद्धि होती गयी और के अभीष्ट प्राप्तिकी भूमिका बनती गयी, उसका एक उदाहरण है 'चरित-सुधा' के श्रीराधारमण चरणदास बाबाजी महाराजके जीवनचरित्रमें दिया गया उनके सत्संगका एक विवरण, जो स्वयं कामिनीबाबूके अपने लिखित विवरणके अनुसार

'एक दिन राजर्षि बहादुर बाबाजी महाशयको किसी महानुभावसे भेंट कराने से गये। कामिनीबाबू भी उनके साथ थे। उक्त महानुभावका बाबाजी महाशयको दर्शन देना तो दूर, वे उनके प्रति बडी विरत्ति दिखाने लगे। और उन्हें उनका वहाँ रुकना भी असा प्रतीत होने लगा। राजर्षिने अपने जीवनमें स्वप्नमें भी कभी ऐसा व्यवहार किसीसे प्राप्त नहीं किया था। वे तो विशेष आनन्द प्राप्त करनेकी आशासे ही वहाँ गये थे. पर हुआ उसके बिलकुल विपरीत। राजर्षि बहादुर बाहरसे कुछ न कह सके। पर उक्त महानुभावकी एक-एक बात को लेकर वे मन-ही-मन इतना व्यथित थे कि उनकी तत्कालीन अवस्था देखकर लगता मानो वे पृथ्वीसे प्रार्थना कर रहे हों- 'माँ वसुन्धरे ! तुम फट जाओ, जिससे मैं तुम्हारी गोदमें समाकर इस असह्य वेदनासे मुक्ति पा सकूँ।'

'बाबाजी महाशयने उक्त महानुभावके उस व्यवहारका परोक्षभावसे अनुभव कर, उन्हींकी शान्तिके लिये, उन्हें प्रणाम्‌कर अन्यत्र प्रस्थान किया। क्षणभर पीछे राजर्षि बहादुर भी उन महानुभावको प्रणाम्कर व्यथित हृदयसे बाबाजी महाशयके पास लौट आये। बाबाजी महाशय उक्त घटनाके विषयमें कुछ न कहकर अपनी स्वाभाविक प्रीति और सरल व्यवहारके साथ लीला-कथा कहते-कहते अपने स्थानपर लौट आये। स्वयं राजर्षि बहादुरके साथ कोई ऐसा व्यवहार करता, तो उन्हें जरा भी दुःख न होता। पर, वे एक ऐसे महापुरुषको साथ ले गये थे, जो जगत्के आदर्श थे, जिन्हें आबाल, वृद्ध, युवा, स्त्री, पुरुष परम सम्मानकी दृष्टिसे देखते थे। ऐसे महापुरुषका इतना अपमान ! राजर्षिकी यह मनोदशा किसी तरह दूर नहीं हो रही थी।

अन्तमें एक दिन बाबाजी महाशयने कुसुम-सरोवरपर राजर्षिका हृाथ पकड़कर गद्गद कण्ठसे कहा- 'भाई बनमाली, यदि तुमने एक दिनके लिए भी कभी मुझे चाहा है, तो आज एक भीख दो। उस दिन उन महानुभावके व्यवहारसे तुम्हें जो दुःख हुआ, वही मुझे भिक्षामें देकर वचन दो कि इस विषयको लेकर फिर कभी तुम उनपर रोष न करोगे।' बाबाजी महाशयकी उस समयकी प्रेम-मूर्तिको देख राजर्षि बहादुर विस्मित हो गये। साश्रुनयन और गद्‌गद कण्ठसे

बोले- 'दादा, आप जो आदेश देंगे. उसका पालन अवश्य होगा। आप कृपा-शक्तिका संचार कीजिये, जिससे मेरी मानसिक मलिनता दूर हो और स्वच्छ भाव पैदा हो।' उस दिनसे राजर्षिके उन महानुभावके प्रति व्यवहारसे ऐसा भी कभी प्रतीत नहीं हुआ कि उक्त घटना कभी घटी थी और वह उन्हें याद है।

'महात्मा राजर्षि बहादुरके मनसे तो यह कालिमा धुल गयी, पर कामिनीबाबूको रह-रहकर बेचैन करती रही। यह बात अन्तर्यामी बाबाजी महाशयने जान ली। एक दिन किसी कार्यसे उन्हें दो-एक दिनको कहीं जाना था, पर जब वे बाबा महाशयसे बिदा लेने गये, तो वे बडे प्यारसे बोले 'भाई कामिनी! हम लोग एकदम पराधीन हैं: किसीके प्रति दोष-दृष्टि रखनेके लिए हमारे पास अवकाश कहाँ ? जीव नित्य कृष्णदास है। नाना प्रकारके झंझटोंमें पड़कर वह इस बातको भूल जाता है और मायाकी श्रृंखलामें बँधकर अभिमान करने लगता है कि मैं धनी हूँ, मानी हूँ, कुलीन, विद्वान, अथवा भक्त हूँ। यदि कोई रागानुग साधक हमारा आदर न करें अथवा हमारे साथ तीखा व्यवहार करें, तब भी हमें यह मानना चाहिये कि वे सदा हमारे हितकारी हैं।

कुछ उपाधियाँ आ जानेसे हमारे साथ ऐसा व्यवहार कर रहे हैं। परस्पर उपाधि-रहित होनेसे क्या फिर प्रेमसे मिलनेमें कोई बाधा हो सकती है ?'

'बाबाजी महाशयकी बात सुन कामिनीबाबूके हृदयमें उक्त महानुभावके व्यवहारको लेकर जो सूक्ष्म रूपसे छिपी हुई कालिमा थी, वह दूर हो गयी।

'एक दिन कामिनीबाबू बाबाजी महाशयके साथ महाप्रसाद पाने बैठे। उस दिन ठाकुरजीको मूँगकी दालका भोग लगा था। कामिनीबाबूने गोविन्द दादासे कहा- 'इस वक्त खटाई डालकर मटरकी दाल बनायी जाती तो अच्छा था।' यह सुन बाबाजी महाशय अपने स्वाभाविक रसपरिपूर्ण सख्य-भावसे मृदुहास्य सहित बोले- 'भाई कामिनी, आज तुमने महान अपराध किया है।' कामिनीबाबूने चौंककर पूछा- 'जी! क्या अपराध किया है मैंने ?' बाबाजी महाशय बोले- 'देखो, कृपाकर जो भी आयें, उनका स्वागत-सत्कार करना हमारा कर्तव्य है। ऐसा न कर उनके आगे दूसरोंकी प्रशंसा करनेका मतलब क्या उनका अनादर करना नहीं है ? इसलिए आज तुमने मूँगकी दालके प्रति अपराध किया है।' बात सामान्य थी। और परिहासके साथ कही गयी थी, पर थी बड़ी शिक्षापूर्ण।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

वास्तवमें जब तक जो मिल जाय उससे सन्तोष न हो, तब तक शान्ति कहाँ ?'

स्वयं राजर्षिजीके संगसे कामिनीबाबुको लाभ हुआ। राजर्षि सचमुच राजर्षि है। राजा होते हुए भी उन्हें विषय-सम्पत्तिसे आसक्ति, स्त्री-पुत्रादिसे मोह और पान-सम्मानादिसे किसी प्रकारका लगाव छूकर भी नहीं गया था। संसारके जितने भी नाते-रिश्ते थे. वे प्रभूसे ही मानते थे। यह इस बातसे स्पष्ट है कि उन्हें यदि कोई सांसारिक सम्बन्धसे पिताजी, चाचाजी, भाईजी आदि कहकर पुकारता, तो वे उत्तर देते। उन्हें 'हरे-कृष्ण' कहकर सम्बोधन करना होता था। राजर्षिजीका यह भाव पर्णरूपसे कामिनीबाबूमें भी संक्रमित हुआ। वे घरमें हों या दफ्तर में उन्हें हर किसीको 'राधेश्याम' कहकर पुकारना होता । राजर्षिका बाह्य अनुकरण मात्र न था। सबसे वे वृन्दावन आये उनका सारा जीवन राधेश्याममय हो गया था।

संसारके प्रति हे उदासीन रहने लगे थे, और राधेश्यामके प्रति आसक्त और

उत्कण्ठित। अब प्रौढावस्थामें उनका भजनावेश इतना बढ़ गया था कि उनके लिए जिरीका काम सम्हालना मुश्किल हो गया था। वैसे तो मैनेजरके रूपमें भी उनका अधिकांश समय विनोद-विनोदनी और साधु-वैष्णवोंकी सेवा और सत्संगमें ही व्यतीत होता था। पर, उन्हें अब राधा-कृष्णकी अष्टकालीन लीलाके चिन्तनका बसका लग गया था। उसके लिए चाहिए था एकान्त और चाहिए थी मैनेजरीके कार्यसे पूर्ण मुक्ति ।

अतः, उन्होंने मैनेजरीसे इस्तीफा दे दिया। राजर्षिजीने ३०) रुपये महीनेकी नेशन बाँध दी, जो उनके अपने निर्वाहके लिए तो पर्याप्त थी, पर उनके समस्त परिवारके लिए नहीं। उनके तीन पुत्र थे- श्रीगौरपद घोष और श्रीसीतानाथ घोष जिनकी शिक्षाकी व्यवस्था होनी थी। पर, कामिनीबाबू तो अपना सारा भार प्रभुपर छोड़कर निश्चिन्त हो चुके थे। भक्तोंका योग-क्षेम वहन करनेवाले प्रभुको इसकी व्यवस्था करनेमें देर न लगी। उन्होंने प्राणगोपाल प्रभुको प्रेरणा देकर उनके कुछ शिष्यों द्वारा इसकी समुचित व्यवस्था करवा दी। एकने श्रीगौरपदको कलकत्तेमें डॉक्टरी पढ़ानेका भार अपने ऊपर ले लिया, दूसरेने श्रीनिताइपदको बनारस हिन्दूविश्वविद्यालयमें इन्जीनियरिंग पढ़ानेका। निताइपद इन्जीनियर बनकर पिताकी आर्थिक सहायता करने लगे।

गौरपद डॉक्टरी पासकर वृन्दावनमें ही प्रैक्टिस करने लगे। सीतानाथजीने भी फोटोग्राफी सीखकर वृन्दावनमें ही अपना स्वतंत्र काम शुरू कर दिया।

कामिनीबाबुको कीर्तनसे बड़ा प्रेम था। उन्हें कीर्तनकी पूरी अभिज्ञता भी थी। दशके बडे-बडे कीर्तनियाँ उन्हें कीर्तन सुनाकर सुखी करते और स्वयं सुखी होते। व्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीगौरपदको प्रसिद्ध कीर्तनियाँ पण्डित श्रीअद्वैतदास

बाबाजीसे कीर्तनकी शिक्षा दिलवायी। गौरपदने शीघ्र एक अच्छे कीर्तनियकि रुपये ख्याति प्राप्त कर ली।

वे अक्सर पण्डित रामकृष्णदास बाबा और श्रीमाधवदास बाबा आदि महात्माओंके स्थानोंपर विशेष अवसरोंपर पिताजीके सान्निध्यमें कीर्तन करते-करते भाव-विभोर हो रोते-रोते उनके चरणोंमें गिर पड़ते। पिता भाव-विभोर हो रोते-रोते उन्हें हृदयसे लगा लेते। पिता-पुत्रको भावमुद्रामें एकत्र जड़ित देख सारा वातावरण भावमय हो उठता।

कामिनीबाबूने अपने उद्योगसे एक संकीर्तन विद्यालयकी भी स्थापना की, जिसके प्रधान शिक्षक थे स्वयं डॉक्टर गौरपद । उसमें बहुत-से छात्रोंकी छात्रवृत्ति देकर संकीर्तन-विद्या सिखायी। खेदकी बात है कि आजकल वृन्दावनमें संकीर्तन लुप्त हो गया है। कितना भी देखनेमें आ रहा है, वह कामिनीबाबूके विद्यालयकी है देन है।

कामिनीबाबूका पांडित्य भी साधारण न था। उन्हें सम्पूर्ण भागवत और चैतन्यः चरितामृत कण्ठ थे। बड़े-बड़े पण्डित, यहाँ तक कि प्राणगोपाल प्रभु तक अपनी शंकाओंके समाधानके उद्देश्यसे उनके पास आया करते। इष्ट-गोष्ठीके लिए महात्माओंका जमघट भी उनके स्थानपर बना रहता। उनकी वृद्धावस्थामें जो महात्मा उनके पास आया करते उनमें श्रीगौरांगदास बाबा, श्रीहंसदास बाबा और श्रीदीनशरणदास बाबा भी हुआ करते। इनके साथ इष्ट-गोष्ठीमें उन्हें बहुत सुख मिलता। एक बार, जब वे ८० वर्षके थे, इनकी उपस्थितिमें ही किसीने उनके द्वितीय पुत्र श्रीनिताइपदके निधनका संवाद उन्हें दिया। उसे सुन उन्होंने कहा- 'जैसी राधारानीकी इच्छा' और पूर्ववत् इनके साथ कथा-वात्तमें लग गये।

कामिनीबाबू का भजन-साधन अन्त तक अबाध गतिसे चलता रहा। वे नित्य तीन लाख हरिनाम जप करते हुए अष्टकालीन-लीला-स्मरणमें निमग्न रहते। जैसे-जैसे उनका भजनमें आवेश बढ़ता गया, उनका आहार-निद्रा कम होता गया। वे २४ घण्टेमें एक बार रात १२ बजे नैश-लीलाके पश्चात् स्मरणमें राधेश्यामको शयन कराकर भोजन करते और आसनपर बैठे-बैठे ही कुछ देर सो लेते। फिर २ बजेसे उठकर निशान्त-लीलाका स्मरण करते।

प्राणगोपाल प्रभु कामिनीबाबूका बड़ा आदर करते। दोनों एक-दूसरेको दादा कहकर पुकारते। दोनों एक-दूसरेसे बहुत दूर रहते हुए भी लीला-स्मरणमें एक- श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी

दुसरेका संग करते। दोनोंको कभी-कभी एक-सी लीलाके दर्शन होते, जिसमें दोनों एक-दूसरेको मञ्जरी रूपमें देखते। दोनों एक-दूसरेको पत्र लिखकर उसकी पुष्टि करते।

कामिनीबाबूका लीलामें आवेश दिन-पर-दिन बढ़ता गया। अन्तमें वे हर समय लीलामें आविष्ट रहने लगे। सम्वत् २०१९, ज्येष्ठ मास कृष्णपक्ष एकादशीके दिन १०६ वर्षकी अवस्थामें कुञ्जविलास-लीला-कीर्तन सुनते-सुनते उन्होंने निकुन्जमें प्रवेश किया।

कामिनीबाबूके परिवारके लोगोंका कहना है कि उनकी उम्र जन्म कुण्डलीके अनुसार ९५ वर्षकी थी। पर, भजनके प्रभावसे बढ़कर १०६ वर्षकी हो गयी। भजनके प्रभावसे सभी कुछ सम्भव है। भजनका भी एक रस है। उसके आस्वादनका साधकमें जब लोभ जागता है, तो भक्तवत्सल प्रभु उसकी उम्र बढ़ा देनेको बाध्य होते हैं !

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीकामिनीकुमार घोष की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।