ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 22

श्रीजगन्नाथदास दादाजी

श्रीजगन्नाथदास दादाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीजगन्नाथदास दादाजी
श्रीजगन्नाथदास दादाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीजगन्नाथदास दादाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

[ बरसाना |

बरसानेके भानुकुण्ड-तीरपर जगन्नाथदास बाबाकी कुटिया है। जगन्नाथदास गले आये थे। बहुत दिनोंसे वैराग्य अवलम्बन कर यहाँ रह रहे हैं। बडे निश्किचन भाषा बर्धमानके हैं। युवावस्थामें राधारानीकी कृपाकी अभिलाषा हृदयमें लेकर यहाँ महात्मा हैं। मधुकरी माँगकर जीवन-निर्वाह करते हैं।

पर, उनकी कुटियामें इन छोटी-छोटी पोटलियों और मटके-मटकियोंमें क्या है। इनमें गुड़ है, चावल है, पुरानी इमली है और हर्रे, बहेड़ा, आँवला चूरन चटनी आदि औषधियाँ हैं। यह सब साधु-वैष्णवों और व्रजवासियोंके लिए हैं। बाबा स्वयं तो मधुकरीमें प्राप्त रोटीके टुकड़ोंके सिवा और कुछ लेते नहीं। साधु-वैष्णवोंके लिए ही तरह-तरहकी औषधियाँ और अन्नादि जुटाकर रखते हैं। आवश्यकता पडनेपर अपने हाथसे रसोई बनाकर भी उन्हें खिलाते हैं।

पर इस समय बरसाने और आस-पासके गाँवोंमें भयानक दुर्भिक्षके कारण ग्राहि-त्राहि मच रही है। बाबाको व्रजवासियोंके घर मधुकरीके लिए जानेमें बड़ा संकोच हो रहा है। क्या करें कुछ समझमें नहीं आ रहा। कुटियामें जो थोड़ी-बहुत सामग्री है, वह तो साधु-वैष्णवोंके लिए है। उसे अपने प्रयोगमें लायें कैसे ? बरसाना छोड़कर जाना भी वे नहीं चाहते। कहीं अन्यत्र जानेकी सोचते हैं तो हृदयमें धद्धकी चलने लगती हैं, साँसें लम्बी खिंचने लगती हैं, नेत्रोंसे गंगा-यमुना बहने लगती हैं।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

कई दिनोंसे बाबा मधुकरीको नहीं जा रहे हैं। आखिर कब तक निराहार रहते। विवश हो उन्होंने बरसानेसे चले जानेका निश्चय किया, पर जो एक मात्र राधारानीके चरणोंका सहारा लेकर उनके स्थानमें हमेशा के लिए डेरा डाल चुका है, उसे वे कब अपनेसे दूर करना चाहती हैं ? उसके जानेका विचार मनमें आते ही अके हृदयमें क्या कम धक्द्धकी होने लगती है ?

बाबा जैसे ही डेरा-डण्डा लेकर बरसानेसे जानेको हुए, एक किशोरी बनवालाने आकर पूछा- 'बाबा, कहाँ जाय रह्यो है ?'

'जाऊँ हैं कहीं' बाबाने नेत्रोंमें आँसू भरकर कहा। 'क्यों ?' बालिकाने फिर पूछा

'अरे पेटको तो कछ देनो पड़ेगो। तेरे हियाँ मधुकरीको टोटो जो पड़ रही है।

'तेरे ताई टोटो बाबा कहा कहै है ? मेरे घर क्यों नई जाय ? आलेवे मधुकरी राखी है तेरे लियें। लै आ जायकें। कहूँ मत जा।'

बाबा भूखे तो थे ही। सोचा जब बालिकाके घरवालोंने मेरे लिए मधुकरी रख छोडी है तो खा-पीकर ही जाना उचित होगा। वे लौट गये अपनी कुटियाको।

सामान वहाँ रख, माल-झोली हाथमें ले नाम करते हुए उस व्रजवासीके घर पहुंचे। बजवासीने बाबाको देखते ही कहा- 'बाबा, जा समय तो मधुकरी हय ना। आगे क्यों नहीं आयो ?'

'तेरी लालीने तो कही मधुकरी आलेमें राखी है. जाई मारे तो आयो ?'

लालीकी बात सुन व्रजवासी चौंका, क्योंकि लाली न जाने कबकी ससुराल गयी हुई थी। पर, उसने बाबासे कुछ नहीं कहा। घरमें जाकर स्त्रीसे पूछा- 'बाबाके ताई मधुकरी आलेमें राखी है का ?' वैसे ही उसने और उसको स्त्रीने जो आलेकी ओर आँख घुमाई, तो वहाँ रोटियाँ रखी देख अवाक् ! स्त्रीने कहा- 'कहाँ तें आयी रोटी ? मैंने तो राखी नाँय !'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

व्रजवासीने फिर भी मधुकरीके रहस्यके बारेमें बाबासे कुछ न कहा। रोटियाँ उन्हें देते हुए बोला- 'बाबा, रोटी रोज आयकें लै जायौ कर।'

डूबतेको तिनके का सहारा बहुत होता है। बाबाने बरसानेसे जानेका विचार छोड़ दिया। रोज उसी व्रजवासीके यहाँसे मधुकरी लाने लगे।

उस व्रजवासी परिवारपर आज भी राधारानीकी प्रचुर कृपा है। 'गौड़ीय-वैष्णव-जीवन' के लेखकने लिखा है कि 'वनखण्डी' नामके उस परिवारके वर्तमान वंशधर ही बरसानेमें सबसे अधिक सम्पन्न और सुखी हैं।

जगन्नाथदास बाबाके वेषके शिष्य श्रीप्राणकृष्णदासजी भी बाबाके शरीर छोड़नेके उपरान्त उस परिवारमें मधुकरीके लिए अवश्य जाया करते।

एक बार जगन्नाथदास बाबाके कनिष्ठ भ्राता उनके दर्शन करने बर्धमानसे बरसाना आये। उन्हें व्रजवासीके घरकी मोटी रोटी खाते देख उन्होंने कहा- 'दादा, यह कण्डोंके समान क्या खा रहे हो ? तुम्हें क्या बर्धमानके सीता-भोगकी याद नहीं आती ?'

बाबाने उत्तर दिया- 'भाई, मैं एक घण्टेका फकीर हूँ, तेइस घण्टोंका बादशाह।'

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीजगन्नाथदास दादाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।