ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 47

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा)

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा) की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा)
श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा) — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा) का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

बाईजी अपनी स्मृति स्वरचित कुछ पदोंमें छोड़ गयी हैं। उनके भक्त उनका संग्रह प्रकाशित करनेकी चेष्टामें हैं। उदाहरण के रूपमें एक पद इस प्रकार है, जो उन्होंने अपने गुरु श्रीसरसमाधुरीजीकी स्तुतिमें लिखा था-

सरस धन रस मेंह बरसावें।

करें गरजना जुगल नाम की, रसिक मोर हरषावें ।।

बिच-बिच झलकन रूप-छटा की दाकिनी दमकावें ।

भक्त जनन की उर अवनी में भाव-वृक्ष प्रकटावें ।।

उमंग हर्ष के भरे सरोवर, नेह लहर लहरावें ।

पावस ऋतु श्रीगुरु-कृपा नित नई मौज दिखावें ।। करें प्रफुल्लित तन-मन सबके, चहुँ दिश आनन्द छावें । प्रेम कोयल मतवाली है के विनती शब्द सुनावें ।।

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी (सूरदास बाबा)

[ वृन्दावन ]

'भैया! मेरे मनमें ऐसी आवे कि विश्वको कुत्ता हू दुःखी न होय, भले ही श्रीजी सबनकौ दुःख मोकूँ दै दें। मेरौ बस चलै तो सबरे जगत्‌को दुःख अपनी छातीपर धर लऊँ।' श्रीकिशोरीशरण बाबा अपने भक्तोंसे अक्सर कहते।

दृष्टिविहीन, पर अन्तर्दृष्टि सम्पन्न, मँझले कदके, छरहरे बदनके, बाहरसे कमजोर दीखनेवाले, पर भीतरसे अपनी अलौकिक शक्तियोंके कारण असाधारण स्त रखनेवाले बाबा किशोरीशरणजी वृन्दावनमें, दुसायत मुहल्लेमें, श्यामकुञ्ज नामक आश्रममें संसारके दीन-दुःखी और अभावग्रस्त जीवोंके लिए कल्तरुके समान और कलिकालके मोहान्ध, पथ-भ्रान्त पथिकोंके लिए अन्धकारमें दिव्य आलोक-पुञ्जके समान विराजा करते। आबाल-वृद्ध-वनिता, अमीर-गरीब, साधु-संन्यासी सभीके लिए उनका दरवाजा सब समय खुला रहता। वे अपने दुःख-

सुख, भाव-अभावकी बात उनसे कहते। बाबा उनकी सुनते, उनका दुःख दूर करने और अपने अमृतमय उपदेशोंसे उन्हें सांत्वना देनेकी चेष्टा करते।

जाडेका दिन है, बाबा कुछ भक्तोंके साथ श्यामाकुञ्जके बरामदे में बैठे अँगीठी प्रेमसे उसे धारण किया। थोडी देर बाद बोले- 'बडी-बड़ी मलूक (सुन्दर) है। जामें ताप रहे हैं। एक भक्तने उन्हें ऊनी कपडेकी एक बड़ी लाकर भेंट की। बाबाने नेंकऊ ठण्ड नायँ लगे।'

उसी समय एक गरीब व्रजवासी ठण्डसे काँपता हुआ आया और बोला- 'बाबा, बड़ी ठण्ड है। मेरे पास कुछ पहननेको नहीं है।'

बाबाने बंडी उतारकर उसे दे दी। देते हुए बोले- 'ले भैया तेरे ताई आजई बनके आयी है।'

एक ग्वालेकी तीन भैंसें चली गयीं। बहत खोज करनेपर भी न मिली। वह भागा आया बाबाके पास। उनके चरणोंमें कुछ भेंटकर उन्हें दण्डवत् की। वह कुछ कहे उसके पूर्व ही भेंट वापस देते हुए बाबा बोले- 'जाको अपने पास रख। भैंस मिल जायें तो अखण्ड कीर्तन करवाय दीजौ।'

उसे आश्चर्य हुआ कि बाबाको इतनी दूरकी बातका बिना उसके कहे कैसे पता चल गया। वह उनके चरण पकड़कर अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे उनकी ओर देखते हुए बोला- 'बाबा, आप कृपा करेंगे तभी न भैंसें मिलेंगी। मेरी तो सारी सम्पत्ति ही है वे। यदि न मिलीं तो मेरे बच्चे भूखे मर जायेंगे।'

बाबाका हृदय पसीज गया। वे बोले- 'चिन्ता न कर। तेरी भैंसें पूर्व दिशामें यमुनाके पल्लीपार उतर गयी हैं। एक पेड़के नीचे बैठी मिलेंगी। दोपहर पीछे जायकें लैं अइयों।'

बाबाके वचन सत्य सिद्ध हुए। उसे यमुनापार निर्दिष्ट स्थानपर भैंसें मिल गयीं। उसने कीर्तनका आयोजन तो किया ही। वह और उसका सारा परिवार बाबासे दीक्षा लेकर उनका शिष्य बन गया।

एक सज्जन और उनकी पत्ना बाबाका नाम सुनकर मिरजापुरसे आये। बाबाके चरणोंमें दण्डवत् कर बोले- 'महाराज, हमारा लड़का खो गया है। हम बड़े दुःखी हैं। आपकी अहैतुकी कृपाका भरोसा लेकर आपकी शरणमें आये हैं।'

कुछ देर मौन रहकर बाबा बोले- 'भैया, तोकूँ अपने छोराको खोजबे कहूँ जानी नायँ पड़ेगी। आज हियाँ भण्डारा है। तेरौ छोरा पंगतमें प्रसाद पामतौ मिल जायगौ।' श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी (सूरदास बाबा)

पति-पत्नी बडी उत्सुकता और व्याकुलताके साथ पंगतकी प्रतीक्षा करने लगे। पंगतके समय उन्होंने चारों ओर घूमकर देखा, तो सचमुच उन्हें अपना लड़का पंगतमें बैठा मिल गया। उन्होंने झट जाकर उसे छातीसे लगा लिया। बाबाके पास लाकर उन्हें दण्डवत् करनेको कहा। बाबाने उसके सिरपर हाथ फेरते हुए माता-पिताके साथ घर जानेको कहा। बाबाके सिरपर हाथ फेरते ही उसके हृदयमें वांछित परिवर्तन हुआ और वह प्रसन्न मनसे उनके साथ घर जानेको राजी हुआ। जाते समय दम्पतिने बाबाको दो सौ रुपये भेंट किये। बाबाने उन्हें लौटाते हुए कहा- 'इसमें तीन सौ रुपये और मिलाना और तुम्हारे गाँवमें जो हनुमानजीका मन्दिर है, उसकी मरम्मत करवा देना।'

सूरदास बाबाके कृपापात्र पण्डित मंगतराम वशिष्ठके सुपुत्र श्रीभूपिन्द्रकुमार शर्मा डॉक्टरी पढने जर्मनी गये थे। बहुत दिनोंसे उनका पत्र न आनेके कारण मंगतरामजी चिन्तित थे। बाबाने अपने दिव्य दृष्टिसे उनका सब हाल जान लिया। मंगतरामजीसे कहा- 'भूपिन्द्रके पेटमें फोडा हो गया था। उसका ऑपरेशन जरूरी था। ऑपरेशन खतरनाक था। जर्मनीके कई बड़े डॉक्टरोंने मिलकर ऑपरेशन किया। ऑपरेशन सफल हुआ। अब वह ठीक है। कमजोर अधिक हो गया है। आठ दिनके भीतर उसके हाथका पत्र आ जायगा, आप चिन्ता न करें।' आठवें दिन पत्र आ गया। उसमें वही सब लिखा था, जो बाबाने बताया था।

निठारी ग्राममें चूहोंका आतंक था। चूहे खेतोंमें खड़ी फसलोंको काट काटकर गिरा देते थे। कृषक बहुत परेशान थे। उन्होंने चूहोंको भगानेके लिए दवाइयों आदिका प्रयोग किया, पर कोई परिणाम न निकला। अन्तमें उन्होंने बाबाकी शरण ली। बाबाने 'गणेश-पूजाके वृहत् अनुष्ठानकी आज्ञा दी। अनुष्ठान आरम्भ हुआ। कई दिन तक जाप और पाठादि चलता रहा। बाबा भी उतने दिन ग्राममें ही रहे और मौन रहकर कुछ जाप और चिन्तन करते रहे। अनुष्ठानके समाप्त होने तक सब चूहे न जाने कहाँ चले गये।

बाबा एक सिद्ध योगी भी थे। वे यौगिक क्रियाओं द्वारा अपने रोगोंका उपचार आप कर लिया करते थे। एक बार वे ऋषीकेशमें बीमार पड़े। डॉक्टरोंने कहा- 'आपका फेंफड़ा गल गया है। इसे आपरेशन करके निकालना होगा।' दूसरे दिन प्रातः वे आसनपर बैठ गये और यौगिक क्रियाके पश्चात् खाँसकर मुँहसे गला हुआ फेफड़ा निकाल दिया। पासमें बैठे स्वतन्त्रता सैनानी श्रीमती चन्द्रवतीके पति

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

श्रीललिताप्रसादजीको उसे खींचकर दिखाते हुए बोले- 'देखो बाबूजी, कैसा रबड़की तरह हो गया है। इसीको निकालनेके लिए डॉक्टर ऑपरेशन करने कह रहे थे।'

उनका योगका एक चमत्कार देखकर तिलपत और भोगलके लोग आश्चर्य चकित रह गये थे, जब उन्होंने एक ही दिन एक ही समय इन दोनों जगहोंक कीर्तनमें भाग लिया था।

बाबाकी बहमुखी प्रतिभामें उनकी विद्वत्ताका स्थान भी कम महत्त्वका न था। यह कहना कठिन है कि उन्होंने विद्याका उपार्जन कब और कैसे किया। पर वे वेद उपनिषद् और पुराणादिके बड़े मर्मज्ञ थे। धर्म-ग्रन्थोंके प्रकाशनमें भी उनकी बड़ी रुचि थी। श्रीहरिलाल द्वारा लिखित राधासुधा-निधिकी रसकुल्या टीकाका प्रकाशन कर उन्होंने उसका निःशुल्क वितरण किया। 'श्रीहित स्फुट-वाणी' और 'श्रीनागरीदासजीकी वाणी'का भी उन्होंने प्रकाशन किया।

बाबा किशोरीशरणजीका जन्म गढ़वालके एक कुलीन ब्राह्मण परिवारमें हुआ। शैषवमें ही माता-पिता परलोक सिधार गये। संसार झणभंगुर है, उसके सम्बन्ध झूठे हैं, इससे शाश्वत सुख और शान्ति प्राप्त करनेकी आशा मृगमरीचिका है- इसका अहसास उन्हें होश सम्हालते ही होने लगा। वे शाश्वत सुखकी खोजमें घरसे निकलकर हिमालयकी ओर चल पड़े। गंगोत्रीके निकट आनन्दगिरि नामके एक संन्यासीसे उनकी भेंट हुई। उनसे संन्यास लेकर वहीं एक गुफामें ध्यान-धारणा करने लगे। पर, उनके रसलोलुप हृदय को यह मार्ग रसके लोभसे ओखलीमें शुष्क तृण-समूहको कूटते रहने जैसा लगा। उन्हें ज्ञानके गह्वरमें अपने बाहर और भीतरका अकेलापन खलने लगा।

भाग्यसे उसी समय उन्हें परसरामदास नामके एक वैष्णव महात्माका संग प्राप्त हुआ। उनके संगसे उनका मन वृन्दाविपिन और उसके सहज-सलौने ठाकुर मोर-पिच्छ-वंशीधारी, रासबिहारी श्रीकृष्ण और उनकी प्राण-प्रिया, परमाराध्य राधा ठाकुरानीके प्रति आकर्षित हुआ। वे उनका स्मरण करते-करते वृन्दावनकी ओर अग्रएर हुए। वृन्दावन पहुँचकर उन्होंने भजन-सिद्ध श्रीपरमानन्ददासजीसे वैष्णवी दीक्षा ली और उनके दोसायत-स्थित स्थानमें रहकर श्रीठाकुर श्यामावल्लभजीको अष्टयाम-सेवाका सुख लेने लगे। परमानन्दजीकी निकुञ्ज-प्राप्तिके पश्चात् उन्होंने इस स्थानका विस्तारकर इसे वर्तमान श्रीश्यामाकुञ्जके नामसे प्रसिद्ध किया।

वे एक नाम-निष्ठ सन्त थे। पर श्रीचैतन्य महाप्रभुके 'जीवे दया, नामे रुचि' धूम-फिरकर लोकोपकारी कार्य करनेमें व्यस्त रहते थे। वे जहाँ भी जाते उनके सिद्धान्तके अनुसार भीतरसे नाम-स्मरणकी साधनामें लगे रहते हुए भी बाहरसे सदा प्रेमीजन जी खोलकर उन्हें भेंट देते। वे भेंटकी शानिको मुस्कराते हुए बगलबन्दीमें खते जाते। जब वह पर्याप्त हो जाती. उसे उसी स्थानपर किसी परमार्थ कार्यक लिए वहाँके लोगोंको सौंप देते। वृन्दावन, तिलपत, पल्ला, मवई, महावतपुर, उल्लभगढ़, भोगल, निठर्रा, रायपुर, व्रजघाट, सूंगरपुर, ऋषीकेश आदि अनेकों स्थानोंमें उनके द्वारा इस प्रकार बनवाये गये मन्दिर, धर्मशाला, अन्नक्षेत्र और प्याऊ आदि उनकी उदारता और पारमार्थिक कार्योंमें अभिरुचिकी आज भी याद दिलाते हैं।

बाबा इतने सामर्थ्यवान और ऐश्वर्यशाली होते हुए भी स्वयं बड़े वैराग्यसे राहते। उनके पास जो कुछ भी आता, उसे वे प्रभु और उनके प्रियजनोंकी सेवाकी सामग्री जानकर तदनुरूप ही उसका व्यय करते। एक बार बिहारके एक महन्थ, जो कृभी बड़े प्रभावशाली थे, पर अब प्रभावहीन और श्रीहीन हो चुके थे, उनके पास आये इसका कारण जानने। उन्हें देखते ही बाबाने कहा- 'भइया भले आये। तुमने श्रीजीकी सम्पत्तिका अपने सुखके साधन जुटानेमें प्रयोग किया, इसीलिए तुम्हारा प्रभाव कम हो गया। साधुका केवल सेवाका अधिकार है और जितनेमें प्रभु और अके जनोंकी सेवाके लिए प्राप्त यह शरीर चल जाय, उतना ही इसके प्रयोगमें ले आनेका।

बाबा तो अपने शरीरको भी अपना न मानते। वे उसे दूसरोंका दुःख दूर करनेका एक उपकरणमात्र समझते। वे अकसर दयापरवश हो दूसरोंका रोग स्वयं ते लिया करते। एक बार कोसीमें उनके कृपापात्र श्रीभार्गव महोदयको अकस्मात् आँखका भयंकर कष्ट हुआ। परिवारमें उदासी छा गयी। रसोई भी उस दिन नहीं सी। अंतर्यामी बाबाको वृन्दावनमें इसका पता चला। वे कोसी जा पहुँचे। बाबाको अकस्मात् आया देख सब लोग परमानन्दित हुए। उन्होंने समझ लिया कि मंगलमूर्ति बबाके आ जानेपर अब अमंगल अधिक नहीं टिकनेका। बाबाने वहाँ पहुँचते ही पहले रसोई बनानेका आदेश दिया। रसोई बनते-बनते भार्गव साहबका कष्ट जाता रहा और बाबाकी आँखोंमें उसी प्रकारके कष्टके लक्षण उभरने लगे। बाबा बिना किसीको कुछ बताये भोगल ग्राम जानेको उठ खड़े हुए।

सबने रसोई बननेके पश्चात् प्रसाद पाकर जानेका आग्रह किया। पर बाबा बोले- 'रसोई तो मैने तुम्हारे लिए बनवायी। मट्टो अभी कुछ नहीं लेना है।' इतना कह वे भोगलके लिए चल पड़े।

साहबकी आँखोंका हुआ था। भार्गव साहबको जब इसका पता चला तो वे भोगण भोगल पहुंचकर उनकी आँखोंका बिलकुल वही हाल हुआ, जो भा गये। बाबाके चरण पकड़कर बोले 'मेरा दुःख मुझे वापस कर दें। मुझसे आपका दुःख देना नहीं जाता।'

तुम्हारे ऊपर दायित्व है। तुम्हारे दुःखी होनेसे सारे परिवारको दुःखी होना पड़ता है। बाबाने कहा- 'मेरा इससे कुछ नहीं बिगडता। तुम सद्गृहस्थ हो। परिवारका तुम जाओ अपना काम करो। मेरा कष्ट अधिक नहीं रहेगा।' फिर भी भार्गत साहब दिल्ली गये और दो नेत्र-चिकित्साके विशेषज्ञ डॉक्टरोंको साथ लेकर

आये। डॉक्टरोंको देख बाबाने कहा- 'इन्हें इनकी फीस देकर वापस कर दो। मुझे नेत्र इन्हें नहीं दिखाने। श्रीराधावल्लभ स्वयं मेरे नेत्र ठीक कर देंगे।'

जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ

दूसरे दिन श्रीराधावल्लभकी कृपासे उनके नेत्र भी ठीक हो गये।

मेरठके एक वकील साहबका लड़का महीने भरसे सख्त बीमार था। उसके बचनेकी कोई आशा न थी। उन्होंने बाबाके पास वृन्दावन जाकर अपना रोना रोया और उनसे उसी समय अपनी गाडीमें मेरठ चलनेका आग्रह किया। बाबा उनका आग्रह न टाल सके। मेरठ जाकर वकील साहबके मकानकी दूसरी मंजिल में उन्होंन लड़केको देखा। वह शायद अन्तिम साँसें लेनेकी स्थितिमें था। उसे देख वे बाहर आ गये और सीढ़ियोंसे नीचे उतरते हुए बोले- 'मैं इसी समय वृन्दावन लौदूँगा। सीढ़ियोंसे उतरते-उतरते उन्हें खूनकी उल्टी हुई। यह देख वकील साहब और पी घबरा गये। उन्होंने बाबासे उस रात उनके घरपर ही विश्राम करनेका आग्रह किया। पर बाबाने एक न सुनी। उन्हें उसी समय वृन्दावन पहुँचाना पड़ा। दूसरे दिन जब वकील साहब घर वापस पहुँचे तो उनका लड़का चारपाईसे उठकर टहल रहा था।

कुछ ही दिनोंमें वह पूर्ण स्वस्थ हो गया। बाबाने उसे देखते ही उसका रोग ले लिया था। तभी उन्हें खूनकी उल्टी हुई थी। वे कुछ दिन बीमार रहकर ठीक हो गये।

बाबाकी परदुःखकातरताकी कोई सीमा न थी। उन्होंने न जाने कितने लोगोंको इसी प्रकार रोग मुक्तकर स्वयं कष्ट भोगा। वे कहा करते- 'मरौ बस चलै तो सबरे जगत्‌को दुःख अपनी छातीपर धर लऊँ।' दूसरोंके दुःख अपनी छातीपर लेते-लेते ही उन्होंने अन्तमें प्राण त्याग दिये। अन्त समय, जब दिल्लीके होली फेमली अस्पतालमें उनका इलाज हो रहा था, उन्होंने पण्डित मंगतरामजीसे का था- 'इस बार मैंने एक ऐसे अपराधीका अपराध मोल ले लिया है, जिससे मैं मौतसे लड़नेकी अपनी सारी शक्ति ही खो बैठा हूँ।' श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी (सूरदास बाबा)

पर, जैसा हम ऊपर संकेत कर चुके हैं. यह बाबाका बाह्य स्वरूप ही था। हिनेका भी उनका मूल उद्देश्य इनके द्वारा अन्य लोगोंमें नाम और नामीके प्रति श्रद्धा अनन्तरमें वे नाम-साधनामें सदा लगे रहते। इस प्रकारके लोकोपकारी कार्योंमें लगे कल्याणके हेतु नाम-जपकी भिक्षा माँगते। नामकी महिमाका वर्णन करते हुए उन्हें भौर भक्तिका बीज वपन करना था। वे इनके बदले लोगोंसे उनके अपने ही विश्वास दिलाते कि नाम ही उनका सच्चा हितैषी, रक्षक, पालक और उद्धारक है। एक बार नामकी महिमाका वर्णन करते हुए उन्होंने अपने अनुभवकी एक बात इस प्रकार कही थी-

'मैने और मेरे दो साथियोंने एक बार काबुलकी यात्रा की। एक दिन प्रातः घार बजे हम लोग कीर्तन करते हुए काबूलसे कुछ दूर एक दर्शनीय स्थानकी ओर जा रहे थे। हममें से एकके पास चाँदीके रुपयोंकी थैली थी, जो रास्ते में फट गयी। पये जमीनपर बिखर गये। हम लोग जल्दी-जल्दी उन्हें समेटने लगे। इतनेमें चार स्ट्रकधारी जंलमें-से निकलकर बन्दूकें हमारी ओर तानते हुए बोले- 'जो कुछ तुम्हारे पास है रख जाओ, नहीं तो मार डाले जाओगे।'

मुझे विश्वास था कि हम श्रीराधावल्लभलालके नामका कीर्तन करते आ रहे है। नाम भगवान् हमारे साथ हैं। वे अवश्य डाकुओंसे हमारी रक्षा करेंगे। इस विश्वासके साथ मैने फिर राधावल्लभ नाम लेना शुरू किया। उसी समय पुलिसके ३. घुड़सवार उन डाकुओंको खोजते हुए उधर आ निकले और उन्हें पकड़कर ले गये।'

बाबा कहा करते - 'सदा प्रसन्न रहो। मुस्काते हुए श्यामा-श्यामका चिन्तन करते रहो और नाम-जप करते रहो। नाम-जपसे प्रसन्नतामें स्थायित्व आता है, नहीं तो प्रसन्नता आती है और चली जाती है।'

राधा-नाममें बाबाकी अनन्य निष्ठा थी। वे कहा करते कि स्वयं श्रीकृष्ण भी यमुना-तटपर कुञ्ज-मन्दिर में योगिराजके समान बैठकर श्रीराधाके चरणकमलोंकी ज्योतिका ध्यान करते हुए और नेत्रोंसे प्रेमाश्च विसर्जन करते हए उनके नामका जप किया करते हैं-

कालिंदीतटकुञ्ज मन्दिरगतो जयोतिर्ध्यानपरः सदा जपति यां प्रेमश्रुपूर्णों हरिः ।।

योगीन्द्रवद्यत्पद ।

(रा० सु० ९५)

निमग्न रहते। अन्तमें उन्होंने लीलामें प्रवेश करनेका निश्चय किया। एक दिन अपने बाबा राधा नाम रटते हुए श्यामा-श्यामकी अष्टकालीन लीलाओंके चिन्तनमें भक्तोंसे यह कहकर इसका संकेत किया कि 'रक्षाबंधनके दिन बारात निकलेगी।' ही श्रावण पूर्णिमा, सम्वत् २०३६ को उन्होंने नित्य-लीलामें प्रवेश किया। इससे पर कोई इस संकेतको समझ न सका। अपने निश्चयके अनुसार रक्षाबन्धनके दिन लगता है कि किसी बडे अपराधीका अपराध अपने ऊपर लेकर शरीर छोडनेकी बात शरीर छोड़नेका एक बहाना मात्र था।

बाबामें जो अलौकिक शक्ति थी वह उन्होंने नाम जप और कीर्तनसे प्राप्त की थी। इसलिए वे जहाँ भी जाते नाम जप और कीर्तनका प्रचार करते। अष्टप्रहर नाम-संकीर्तन और भण्डारे तो उनके साथ नित्य लगे ही रहते। कभी-कभी मुसलमान भक्त भी उनके कीर्तनोंमें सम्मिलित होते देखे जाते।

राधाष्टमीका उत्सव वे बड़ी धूमधामसे मनाते। उस दिन उनके स्थानपर साधु-वैष्णव-सेवाका विराट् आयोजन होता। सहस्रोंकी संख्यामें साधु-महात्मा और गृहस्थ, सेठ-साहूकार और दरिद्र-भिखमंगे भरपेट प्रसाद पाते। सभीके लिए उनका दरवाजा खुला रहता। यदि भण्डारेमें कमी पड़ जाती और सेवकगण उनके पास जाकर चिन्ता व्यक्त करते, तो वे स्वयं भण्डारेमें जाते। लड्डू-पूरी आदिपर हाथ फेरते हुए कहते - 'सामान तो बहुत है। तुम लोग व्यर्थ चिन्ता करते हो। देखो, भण्डारेकी जिम्मेदारी मेरी है, पंगतकी तुम्हारी। तुम निःसंकोच खुले हाथसे परसते जाओ।' सेवकगण ऐसा ही करते और भण्डारेमें कभी किसी प्रकारकी कमी न पड़ती।

सन्ध्या समय वे अपने स्थानसे गाजे-बाजे और तरह-तरहकी आकर्षक चौकियोंके साथ एक विशाल शोभा यात्रा निकालते। शोभायात्रामें सम्मिलित उनके सहस्रों भक्तोंकी कीर्तन-ध्वनिसे वृन्दावनका आकाश गूंज उठता। आज भी उनके भक्त उसी उत्साहसे राधाष्टमीका उत्सव मनाकर वृन्दावनके जनमानसमें उनकी पुण्य स्मृति जगाते रहते हैं।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीहितकिशोरीशरण बाबाजी ( सूरदास बाबा) की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।