ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 6
श्रीहित सन्तदास बाबाजी
श्रीहित सन्तदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहित सन्तदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
[ वृन्दावन ]
आजसे लगभग ५० वर्ष पूर्व वृन्दावनके परिक्रमा मार्गपर बाराहघाटसे आगे एक बगीचेके भीतर छतरीमें बाबा सन्तदासजी रहा करते थे। वे जम्मू के रहनेवाले थे। राधाबल्लभ सम्प्रदायमें गोस्वामी राधालालजीसे दीक्षित थे और श्रीहित स्वामिनीशरणजीके भेक-शिष्य थे।
बडे सन्त-सेवी थे वे । नित्य व्रजके दस-बारह गाँवोंसे आटेकी भिक्षा करते। अपने हाथसे रसोई बनाकर ठाकुरको भोग लगाते और सन्तोंको पवाते। मन्त-सेवाके पश्चात् सन्ध्या-समय स्वयं भोजन करते। जो भी साधु उनकी कुरियापर आता, वह भूखा न जाता।
चित्रकूटके करबी स्थानके महन्त श्रीजगदेवदासजी भी बड़े सन्त-सेवी थे। वे बहुत वैभव-सम्पन्न थे। अपने सारे वैभवकी सार्थकता सन्त-सेवामें मानते हुए दिन-रात उनकी सेवामें जुटे रहते थे। एक बार कुछ सन्त वृन्दावनमें सन्तदासजीके सानपर कुछ दिन रहनेके पश्चात् घूमते-फिरते चित्रकूट पुहँचे। जगदेवदासजीसे उदोंने सन्तदासजीकी सन्त-सेवाकी बड़ी प्रशंसा की।
जगदेवदासजी एक बार वृन्दावन पधारे। सन्तदास बाबाके दर्शकी लालसासे पूछते-पूछते मदनटेर पहुँचे। वहाँ जाकर देखा कि एक दीर्घकाय, गौरवर्ण बाबाजी, जिनके दाहिने कन्धेपर एक बांसके दोनों सिरोंसे दो पोटलियाँ लटक रही हैं और सिरपर मठेकी हँड़िया रखी है, बाएँ हाथसे रस्सीसे बँधा लकड़ीका एक गट्ठर बींचते चले आ रहे हैं।
'यहाँ सन्तदास बाबा कहाँ रहते हैं ?' उन्होंने उनसे पूछा।
'यहीं पासमें रहते हैं, आइये मैं आपको वहाँ ले चलता हूँ' उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा।
जगदेवदासजी उनके पीछे हो लिये। थोडी दूर जाकर बाराहघाटकी एक उतरीके सामने बाबाने अपना सामान रखा। जगदेवदासजीसे कहा- 'थोडा यहाँ
विश्राम करें। फिर मैं आपको सन्तदासजीसे मिला दूँगा।'
जगदेवदासजी वहाँ बैठ गये। बाबाके परिचय पूछनेपर उन्होंने अपना परिचय आपकी सन्त-निष्ठा और सन्त-सेवाकी बड़ी प्रशंसा सुनी थी। आज आपके दिया। सुनते ही उन्होंने साष्टांग दण्डवत् की और बोले- 'अहो भाग्य महाराज। दर्शनकर कृतार्थ हुआ। अब आपको ऐसे नहीं जाने दूँगा। आप विश्राम करें। इतनेये मैं रसोई बनाकर ठाकुरको भोग लगाता है। आप प्रसाद पालें, तब सन्तदासजीके
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
'नहीं बाबा, मैं प्रसाद नहीं पाऊँगा। पहले सन्तदासजीके दर्शन करूंगा' कहते पास ले चलूँगा।' हुए महन्तजी उठ खड़े हुए।
पर, बाबा कब माननेवाले थे। हाथ पकड़कर बलपूर्वक बैठाते हुए उन्होंने विनम्रभावसे कहा- 'महाराज ऐसा न करें। न जाने मेरे कौन-से पूण्यके सहसा उदय होनेपर आपने दर्शन दिये। अब यदि मेरे सेवा ग्रहण किये बिना ही चले जायेंगे तो मुझे अपार दुःख होगा। मैं ऐसे न जाने दूँगा।
महन्तजी क्या करते। उन्हें रुक जाना पड़ा। प्रसाद भी ग्रहण करना पड़ा।
प्रसाद ले चुकनेके पश्चात् उन्हें एक और विनयपूर्ण आग्रहका सामना करना पड़ा।
'अब आप कुछ पल लेट जायें। मैं आपकी चरणसेवा कर दूँ। संतदास बाबा तो मिले ही समझिये। वे कहीं दूर थोडे ही हैं बाबाने छतरीके निकट एक वृक्षके नीचे उनके लिए खटिया बिछाते हुए कहा।
महन्तजी बाबाके प्रेम और सेवाभावसे इतना अभिभूत हो चुके थे कि उनका आग्रह टालनेका प्रश्न ही नहीं उठता था। वे खटियापर लेट गये और बाबा उनके चरण दबाने लगे।
थोड़ी देरमें एक-एक कर और भी कई सन्त वहाँ पहुँचे। बाबाको एक नरे साधुकी चरण-सेवा करते देख एकने कौतूहलवश पूछा-
'ये महात्मा कौन हैं, बाबा ?'
'आप चित्रकूटके करवी स्थानके महन्त श्रीजगदेवदासजी है।'
'यहाँ कैसे पधारे हैं ?'
महन्तजीने स्वयं उत्तर देते हुए कहा- 'वृन्दावन दर्शन करने आया था। सन दास बाबाकी महिमा सुन रखी थी। सोचा उनके दर्शन करता चलूँ। पूछता-पूछत यहाँ आया, तो इन बाबाजीके प्रेम-जालमें फँस गया। अब इनके जालसे निकल पाऊँ तो उनके दर्शन करूँ।'
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
सन्तने मुस्कुराते हुए एक बार बाबाकी ओर देखा, एक बार महन्तजीकी ओर। बाबाने ओंठ दबाकर फूटती हई हँसी छिपानेकी चेष्टा की। यह देख महन्तजी कुछ कहने जा रहे थे, उसके पूर्व ही सन्तने कहा-
'बाबा सन्तदासजी ही तो आपकी चरणसेवा कर रहे हैं। लगता है. इन्होंने आपके साथ कुछ छल किया है।'
यह सुन महन्तजीने झट उठकर बाबाको हृदयसे लगा लिया। उनके नेत्र सजल हो गये। वे कहने लगे
'बाबा, मैंने आपको जैसा सुना था, वैसा पाया। आपके दर्शनकर धन्य हुआ। आप-जैसा सन्तसेवी मैंने दूसरा नहीं देखा।'
'यह तो आप दैन्यवश कह रहे हैं। सच्चे सन्तसेवी तो आप हैं। आप जितनी अन्तसेवा करते हैं उसके एक अंशका अंश भी तो मैं नहीं कर पाता।' बाबाने स्मतापूर्वक कहा।
'मेरी सेवा केवल धनसे होती है, आपकी तन और मनसे होती है। मैं अपने अाश्रितों द्वारा सेवा करता हूँ, आप स्वयं करते हैं।' इतना कह महन्तजी एक पल ग्रुप रहे। फिर थोड़ा मुस्कुराते हुए बोले-
'आपकी सेवाकी एक विशेषता और है। आप सन्तसेवामें छल-बलका भी प्रयोग करना जानते हैं, जो मुझे नहीं आता।'
'वह आपको कैसे आयेगा ? उसे सीखनेके लिए मर्यादा पुरुषोत्तम राघवेन्द्रका आश्रय छोड़ छलिया नन्दनन्दनका दासत्व जो स्वीकार करना होगा। राघवेन्द्रको कब आती हैं वह सब कलाएँ, जो नन्दनन्दनको उनकी स्वभावगत सम्पत्तिके रूपमें सहज ही प्राप्त हैं।'
इस प्रकारके कुछ हास्य-विनोदके पश्चात् महन्तजी विदा हुए और लेते गये अपने साथ सन्तदासकी सन्तसेवा-वृत्तिकी अमिट छाप ।
सन्तदासजी सन्त-सेवी तो थे ही, साहित्य-सेवी भी थे। उन्होंने राधावल्लभअग्रदायके साहित्यकी बड़ी सेवा की। श्रीहीरालाल व्यासकृत राधासुधानिधिकी सिकुल्या टीका और चाचा वृन्दावनदासके १०८ ग्रन्थों सहित समस्त राधावल्लभीय साहित्यकी लिपियाँ तैयार कर उन्होंने उनका जीर्णोद्धार किया।
सेवा और समर्पण — जीवन-संदेश
सेवा का मूल्य केवल बाहरी कार्य में नहीं, बल्कि उसके पीछे के निष्कपट भाव में भी होता है। इस चरित्र के प्रसंगों को पढ़ते समय सेवा के इसी भाव पर विचार किया जा सकता है।
कथा का सार
श्रीहित सन्तदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।