ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 30

श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा

श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा
श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

बँगालके पावना जिलेमें सिराजगञ्जके निकट कयड़ा ग्राम है। वहाँ श्रीकृष्णमोहन भौमिकके घर श्रीहरिसुन्दर भौमिकने जन्म लिया। वेष-परम्परानुसार श्रीनरोक्तम ठाकुरकी परम्परामें दीक्षा ली। थोड़े ही दिन संसार-कार्य कर जब गुजर

प्रवेश करते ही भजनमें ऐसा डूबे कि भक्तोंके साथ श्रवण-कीर्तनादिमें देह-गेह, दिन और रात सब भूल जाते । शारीरिक नियमोंकी भी रक्षा न कर पाते, इसलिए करने लायक धन एकत्र हो गया, तब महत् कृपासे भक्ति राज्यमें प्रवेश किया। अकस्मात् उत्कट व्याधिग्रस्त हो पड़े।

भक्तोंकी विपत्ति भी सहायक सिद्ध होती है। व्याधिके कारण जीवन थोडा ती अवशिष्ट जान वे केवल भजनमें आविष्ट रहने लगे। परिणामस्वरूप उन्हें शीघ्र भाव-भक्ति प्राप्ति हुई।

सन् १८९० में वे सपरिवार वृन्दावन गये। वहाँ राजर्षि बनमाली रायसे भेंट हई। दोनों एक-दूसरेका परिचय प्राप्तकर परमानन्दित हुए। बनमाली रायने उन्हें शिक्षा-गुरुके रूपमें स्वीकार किया और उनका अधिक-से-अधिक संग लाभकरनेके उद्देश्यसे उन्हें अपने निकट ही रख लिया। कुछ दिन वृन्दावन रहकर दोनों नवद्वीप होते हए अपने-अपने घर चले गये। पर, वहाँ जाकर भी एक-दूसरेके यहाँ आना-जाना लगा रहा। कभी बनमाली राय अपने ठाकुर श्रीराधा-विनोद और परिवारके साथ भौमिकजीके घर कपड़ा ग्राम जाकर रहते, कभी भौमिकजी सपरिवार बनमाली रायकी राजधानी बनवारीनगर जाकर रहते।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

सन् १८९४ में बनमाली राय राधाविनोदजी, अपने परिवार तथा भौमिकजी और उनके परिवारको साथ ले वृन्दावन आये। तबसे सन् १९०४ तक, जब भौमिक महाशयको रजप्राप्ति हुई दोनों एक साथ वृन्दावनमें रहे।

भौमिकजी महाशय सर्वदा भावविष्ट रहते। कभी भी उन्हें राधारानीके चरण विस्मृत न होते। सोते-जागते, खाते-पीते, चलते-फिरते हर समय राधारानीकी स्मृति उनके साथ रहती। सोते-जागते, खाते-पीते राधारानीकी विस्मृति होना तो दूर, उन्हें राधारानीकी स्मृति खाने-पीने, सोने-जागनेकी अकसर विस्मृति करा देती। कई-कई दिन बिना आहार और निद्राके व्यतीत हो जाते। बीच-बीचमें उत्कट व्याधि भी हो जाती, पर यह देखकर लोग विस्मित हो जाते कि भीषण कष्टकी अवस्थामें भी उनके मन-प्राण राधारानीके चरणोंसे विलग न होते।

कथा का अंतिम प्रसंग और प्रेरणा

सन् १९०४ के आषाढ़ मासमें राजर्षि बनमाली रायके कामदार भक्त श्रेष्ठ श्रीकामिनीबाबूको बँगाल जाना था। जानेके पूर्व वे भौमिकजीसे अनुमति लेने गये। उन्होंने कहा- 'जा रहे हो तो जाओ, पर जल्दी आना। मुझे अब अधिक दिन नहीं रहना है। साक्षात् दर्शनकी मेरी साध पूरी हो चुकी है।'

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।