ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 33

श्रीहरिदास बाबाजी

श्रीहरिदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहरिदास बाबाजी
श्रीहरिदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीहरिदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

कुण्डमें स्नान करते समय उन्होंने ट्स खोला। दयालदास बाबाने पूछा- 'यह क्या है ?' उन्होंने कहा- मुझे हॉर्नियाँ है। हॉर्नियाँमें इसे पहनना आवश्यक होता है।'

बाबाने कहा- 'उसे फेंक दो। अब उसकी आवश्यकता न होगी।' ট

उन्होंने ट्स फेंक दी। उसी समयसे उनका हॉर्नियाँ भी न जाने कहाँ चला गया। उन्हें सारा जीवन हॉर्नियाँकी शिकायत फिर नहीं हई।

शेष जीवनमें बाबा वृन्दावनमें कालीदहपर सिद्ध श्रीजगदीशदास बाबाकी कुटियाके पीछे एक कुटियामें रहने लगे थे। श्रीप्राणकृष्णदास बाबा तब उनकी सेवा करते थे।

[ गोविन्दकुण्ड, गोवर्धन ]

वृन्दावनके दयालदास बाबाजी महाराजके शिष्य श्रीहरिदास बाबाजीने पहले ७-८ वर्ष आरिट् ग्राममें, फिर १० वर्ष गोवन्दिकुण्डमें, फिर ५ वर्ष पैठा ग्राममें और अन्तमें ६ वर्ष जतिपुरामें रहकर भजन किया। जब वे गोविन्दकुण्डमें भजन करते थे, श्रीअद्वैतदास बाबाजी भी उन्हींके निकट एक कुटियामें रहते थे। वे उनकी बाह्य और अंतः दशासे भाली भाँति परिचित थे। उन्होंने उनके विषयमें श्रीहरिदासजीको जो बताया था, उसका उल्लेख उन्होंने 'गौड़ीय-वैष्णव-जीवन' में इस प्रकार किया है-

श्रीहरिदास बाबाजी व्रजमें उत्पन्न अन्नकी बनी व्रजवासियोंकी मधुकरी पाते, व्रजकी रजके बने पात्र और व्रजके ही बने आसन-वसनादिका व्यवहार करते अपने को नीचातिनीच जान भीत-भीतसे सबसे दूर रहकर एकान्तमें भजन करते। कहीं जाते समय एक जीर्ण कन्था उनके कन्धेसे लटकता रहता, जो उनके पीछे उनके चरण-चिह्नोंपर से घिसटता हुआ उन्हें मिटाता चलता, स्वयं वे व्रजमें सर्वत्र श्रीकृष्णके चरण-चिह्नोंका अन्वेषण करते चलते।

उनकी जिह्वाने स्वाद किसे कहते हैं. कभी नहीं जाना। यदि कोई उनके पास मिष्ठान्नादि प्रसाद लेकर आता, तो उसे बडे आदरसे ग्रहण करते। कुटियाके भीतर

जाकर उसमें से रञ्च मात्र लेकर प्रसादरूपसे उसका सम्मान करत। वाकी रजके पात्रमें अलग रख देते। पहलेसे रखी कुछ शुष्क मधुकरी खाकर कुरिया बाहर निकलते। प्रसाद लानेवाले सज्जनसे कहते- 'मैंने आपका दिया प्रसाद साह पा लिया।' रात्रिमें वनमें जाकर उस प्रसादको किसी वृक्षके नीचे रख देते। भजन विक्षेप होनेके भयसे अपने हाथसे किसीको कभी न देते।

उनकी कुटियाम प्रकाश कम ही प्रवेश करता। दिनमें भी अँधेरा-सा रहता। उसमें पृथक-पृथक रजके पात्रोंमें विभिन्न महात्माओंका अधरामृत और चरणामृत रहता जिसका वे नित्य सेवन करते।

वे न धातु स्पर्श करते, न वजके बाहरकी कोई वस्तु। किसी विषये व्यक्तिका संग या उसकी दी हई किसी वस्तुका व्यवहार करनेका तो कोई प्रश्न है न था। उनका अन्तःकरण इतना शुद्ध था कि जिस प्रकार उजले वस्त्रपर हल्का-सा भी दाग दीख जाता है, उसी प्रकार, किसी विषयी व्यक्ति या उसकी किसी वस्तुका दूरका भी अनजाने उनसे संग हो जाता, तो उन्हें तुरन्त भासने लगता।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

वे जन-सम्पर्कसे दूर रहनेके लिए रातमें गोवर्धन परिक्रमा करते। एक बार रातमें परिक्रमा करते-करते सवेरा हो गया और वे कुटिया तक न पहुँच पाये। रास्तेमें सोचने लगे कि एक बड़ा मन्दिर बनवाते और उसमें वैष्णव-सेवाको सुन्दर व्यवस्था कराते तो कितना अच्छा होता। इस प्रकारकी मनोवृत्ति मनमें उदय होत ही वे उसका कारण खोजने लगे। पीछे मुड़कर देखा तो एक सेठजी उनके पीछे-पीछे आ रहे थे। वे समझ गये कि उनके मनमें जो विचार आये थे वह उनके संगसे उत्पन्न हुई संगजनित मनोवृत्तिके कारण थे।

एक दिन उन्होंने स्वप्न देखा कि एक मनुष्यने एक दूसरे मनुष्यके शरीरकी सारी खाल उधेड़ दी है। अन्वेषण करनेपर पता चला कि उसके पूर्व दिन उन्होंने जो एक व्रजवासी पुजारीकी दी हुई मधुकरी खायी थी, वह उसने एक क्षेत्रसे लाकर उन्हें दी थी। क्षेत्र इलाहावादके एक डॉक्टर द्वारा चलाया जा रहा था। उसका अन खानेसे जो अन्नजनित मनोवृत्ति उत्पन्न हुई थी, वहीं उनके स्वप्नका कारण भी।

हरिदास बाबा सदा भावोन्मत्त रहते थे और उसी दृष्टिसे जगत्‌को देखते थे। एक दिन ज्येष्ठ मासमें भरी दुपहरीमें कुटियासे निकलकर उत्तम गिरितटसे होते हुए कहीं दूर शौचको गये। अद्वैतदास बाबाने उन्हें जाते देखा। दो घण्टे बीत गये, फिर भी उन्हें लौटा न देख वे उनकी खोजमें निकले। थोडी दूर जाकर देखा कि वे धूपभशान्त और निस्पन्द अवस्थामें खड़े हैं। उनके दोनों नेत्रोंसे अश्रु प्रवाहित हो रहे।

और बीच-बीच में शरीर कम्पायमान हो रहा है। अद्वैतदास बाबाजीने जान लिया कि वे किसी भावमें डूबे हैं। इसलिए उनके निकट न जाकर वे अपनी कुटियाको लौट ये। जब बाबा लौटे तो उन्होंने पूछा- 'बावा, आज शौचमें इतनी देर क्यों लगी?'

उन्होंने कहा- 'क्या बताऊँ ? इतने दिनोंसे गिरिराजने अपने चरणोंमें आश्रय दे रखा है, पर आज तक किसी गधेका-सा भी भाव नहीं दिया। चलो तुम्हें दिखाऊँ, तो तुम समझोगे।'

वे अद्वैतदास बाबाजीको उसी स्थानपर ले गये जहाँ उन्होंने उन्हें भाव-मुद्रामें बडे देखा था। एक गढेकी ओर इंगित करते हुए उन्होंने कहा- 'यह देखो।' फिर बोले- 'देखा ? क्या देखा?'

'यही कि एक गधा कीचड़में लोट रहा है' अद्वैतदास बाबाजीने कहा। हरिदासजीने प्रेमावेशमें एक थप्पड़ मारनेका-सा उद्यम कर उनके सिरपर हाथ फेरते हुए कहा- 'बस यही !'

तब वे समझ गये कि वे क्या कहना चाह रहे हैं- 'श्रीराधाकृष्णकी चरण धूलि समझ गधा प्रेमावेशमें रजमें लोट-पोट हो रहा है।' हरिदासजी कुछ दिन ऐरावत कुण्डके दाहिनी ओर बनखण्डीमें रहे थे। एक दिन सन्ध्या समय जब वे जतीपुरासे मधुकरी कर लौट रहे थे, रास्तेके ठीक बगलमें एक बाघ बैठा था। वे 'श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु नित्यानन्द' इत्यादि नाम करते-करते भावमग्न अवस्थामें चले जा रहे थे। उसी अवस्थामें नाम करते-करते बाघके समनेसे निकल आये। फिर भी उसकी ओर लक्ष्य नहीं किया। मानो बाघ भी नाम-वनि सुन आविष्ट जैसा चुपचाप बैठा रहा। जब वे कुछ आगे निकल आये, उन्हें 'थान आया कि पथमें कोई जानवर बैठा था। उन्होंने सुन रखा था कि वहाँ बाघ रहता है। इसलिए उन्हें फिरकर देखनेका कौतूहल हुआ। उन्होंने उलटकर देखा तो सचमुच बाघ बैठा था।

गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा

उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वे उसके मुँहके सामनेसे चले आये और वह जड़वत् बैठा रहा।गोविन्दकुण्डमें रहते समय एक पच्चीस वर्षका व्रजवासी ब्राह्मण उनकी शरणमें आया और उनसे गुरु-दीक्षा देनेका आग्रह किया। वे व्रजवासी मात्र में गुरु-बुद्धि रखते थे। तो इस ब्राह्मणको दीक्षा कैसे देते ? उन्होंने विनयपूर्वक अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। फिर भी ब्राह्मण उनकी एकान्त शरणमें पड़ा रहा। अन्तमें

उन्होंने उसे गुरु-सेवा बुद्धिसे उपदेश देकर दीक्षा और वेष प्रदान किया। नाम रखा श्रीहरेकृष्णदास, पर उन्होंने किसी दिन हरेकृष्णदासकी सेवा स्वीकार नहीं की।

हरेकृष्णदासजीसे गुरुदेवके अप्रकट होनेके पश्चात् उनका विरह सहन न हुआ। उन्होंने भी उनके आसनके निकट आसन जमाकर साल भर तक एकान्त भावसे भजन करते हुए उनका अनुगमन किया। गुरु-शिष्य दोनोंकी समाधियाँ जतीपुरामें ऐरावतकुण्डके पश्चिममें हरजीकुण्डके तीरपर विद्यमान हैं।

गोविन्दकुण्डमें रहते समय एक पच्चीस दर्पका वजवासी ब्राह्मण उनकी शरणमें आया और उनसे गुरु-दीक्षा देनेका आग्रह किया। वे व्रजवासी मात्र में गुरु-बुद्धि रखते थे। तो इस ब्राह्मणको दीक्षा कैसे देते ? उन्होंने विनयपूर्वक अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। फिर भी ब्राह्मण उनकी एकान्त शरणमें पड़ा रहा। अन्तमे १३८ ]

उन्होंने उसे गुरु-सेवा बुद्धिसे उपदेश देकर दीक्षा और वेष प्रदान किया। नाम रखा श्रीहरेकृष्णदास, पर उन्होंने किसी दिन हरेकृष्णदासकी सेवा स्वीकार नहीं की।

हरेकृष्णदासजीसे गुरुदेवके अप्रकट होनेके पश्चात् उनका विरह सहन न हुआ। उन्होंने भी उनके आसनके निकट आसन जमाकर साल भर तक एकान्त भावसे भजन करते हुए उनका अनुगमन किया। गुरु-शिष्य दोनोंकी समाधियाँ जतीपुरामें ऐरावतकुण्डके पश्चिममें हरजीकुण्डके तीरपर विद्यमान हैं।

गुरु और साधना — जीवन-संदेश

गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

कथा का सार

श्रीहरिदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।