ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 27

श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी

श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी
श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

[ ऊँचा गाँव ]

श्रीहरिगोपाल गोस्वामी बरसानेकी श्रीजीको प्रकट करनेवाले व्रजाचार्य श्रीनारायण भट्टके वंशज थे। वे ऊँचा ग्रामके श्रीधूलेश्वर गोस्वामीसे दीक्षित थे। अलवर स्टेटके नीमरानामें रहते थे। वहाँ उनकी गद्दी थी और उनके ठाकुर श्रीलाड़िले सरकारकी सेवा। वहाँके राजा उनके शिष्य थे।

वे एक अच्छे वैद्य थे। वैद्यक द्वारा जीविका चलाते थे, पर पढ़ने-लिखनेका उन्हें बड़ा शौक था। वे हिन्दी, संस्कृत, तेलुगू और अँग्रेजी भाषाएँ जानते थे। पडदर्शनोंका उन्हें अच्छा ज्ञान था। भागवतके भी वे अच्छे ज्ञाता थे। हरियाणामें उनका बड़ा प्रभाव था। बहत-से ठाकुर, गूजर और यादवादि उनके शिष्य थे।

वे बड़े सीधे-सच्चे और सादे किस्मके महानुभाव थे। उनका जीवन आडम्बर-शून्य था, पर वे बडे भजननिष्ठ थे। वद्धावस्थामें उनका मन अलवरसे ऊब गया और वे एकान्त-भजनके उद्देश्यसे बरसानेके निकट ऊँचा ग्राममें जाकर रहने लगे। अपने लाडिले सरकारको भी अपने साथ ले गये।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

ऊँचा ग्राममें उनके पूर्वजोंका प्राचीन दाऊजीका मन्दिर है, जिसमें नाराका ललिताजीका प्राचीन मन्दिर है। उसकी दाहिनी ओर सघन कुञ्जोंसे परिवेष्ठित भट्टजी रहा करते थे। उसीमें वे भी रहने लगे। मन्दिरके सम्मुख पहाडीके शिवराय सुरम्य निर्जन स्थान है। गोस्वामीजी दिनमें उन कुञ्जोंमें जाकर भजन करते, राधि घर लौट आते। पर, रात्रि भी प्रायः भजनमें और राधारानीकी यादमें रोते-रोते है व्यतीत करते।

इस प्रकार जीवनके अन्तिम २० वर्ष उन्होंने एकान्त भजनमें व्यतीत किये अब उनकी अवस्था १०० वर्षसे भी अधिक हो चुकी थी। ३० मार्च स १९८०, वैशाखी पूर्णिमाकी रात, पूर्ण स्वस्थावस्थामें वे एकदम चीख पडे-५ जाऊँगा। श्रीजीके कपाट खुल गये हैं! पूर्णमासी आ गयी हैं !'

कथा का अंतिम प्रसंग और प्रेरणा

घरके लोग सोते-सोते चौंक पड़े। हक्का-बक्कासे पूछने लगे जायेंगे ? रातके १२ बजे हैं। अभी श्रीजीके कपाट कहाँ खुले हैं ?'

कौन जाने उनके शब्द कानमें पड़े भी या नहीं। वे अपनी धुनमें 'राधा, राधा रटते रहे। राधा-राधा रटते रात २ बजे उनका कपाल फट गया। क्षण भरके लि कमरेमें एक दिव्य प्रकाश छा गया। उसी समय उनका जड़ शरीर तकियेके सहो पीछे लुढ़क गया और अपने सिद्ध सहचरी देहसे वे श्रीजीके नित्य-निकुञ्जमें प्रवेश कर गये !

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीहरिगोपाल गोस्वामीजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।