ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 29

श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी

श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी
श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

[ राधाकुण्ड ]

भजनानुरागी व्यक्तिको किस प्रकार समयका सदुपयोग करना चाहिये, इसका उज्ज्वल दृष्टान्त श्रीहरेकृष्णदास बाबाके जीवनमें देखनेको मिलता है। उन्होंने किसी एक स्थानमें रहकर भजन नहीं किया। पर, वे जहाँ भी रहे वहाँ इस प्रकार रहे कि देह-सम्बन्धी कार्योंमें कम-से-कम समय लगे और भजनमें अधिक-से-अधिक। वे शेषरात्रिमें उठते। माला रख और करुआ हाथमें ले भागते-भागते जाते शौच और स्नानादि करने। लौटकर आते भागते-भागते और झटपट तिलकादि कर भजनने बैठ जाते। मध्याह्नमें भजनसे उठते। स्नानादिकर एक टूटे-फूटे शीशेकी सहायताने तिलक करते, तुलसी तले गिरिराजको दो तुलसीके पत्ते चढ़ाकर मधुकरीका झोल श्रीहरिसुन्दर भौमिक भुञा

हाथ में ले मधुकरीको जाते। शीघ्र मधुकरीसे लौटकर हस्तलिखित बाद-पुष्पाञ्जलिके भाषानुवादके कुछ पृष्ठ पढ़ और मधुकरी ग्रहणकर भजनमें बैठ जाते। सन्ध्या समय फिर शौच-स्नानादि कर भजनमें बैठते। रात्रिमें सोते या जागते कोई नहीं जानता, पर वे रात्रिमें भोजन बिलकुल न करते।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

वृद्धावस्थामें वे राधाकुण्डमें नूतन घेरेमें रहकर भजन करने लगे थे। उनका तीव्र अनुराग देख एक बार श्रीकामिनीकुमार घोषने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा- 'मैं बाल्यकालसे ही निद्रातर हैं। भजन-साधन नहीं कर पाता। आप मेरे ऊपर कुछ कृपा करें।'

उन्होंने कहा- 'जब नव-दम्पतिका मिलन होता है, तब क्या उन्हें निद्रा आती ? प्राणमें अनुराग जागनेसे निद्राका अपने-आप लोप हो जाता है। तुम्हारे सिद्ध देहमें किस अंगमें कौन-सा अलंकार है, इसका ध्यान किया करो।'

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

कामिनीबाबूने पूछा- 'क्या मैं कभी-कभी आपके दर्शन करने आ सकता

?'

उन्होंने उत्तर दिया - 'आना, पर बहुत देर तक मत बैठना।'

इसके कुछ ही दिन बाद शरद्-पूर्णिमाकी रात्रिमें वैष्णवगण कीर्तनके साथ कुण्ड-परिक्रमा कर रहे थे। उस समय उन्होंने उनकी कुटियाके निकट उन्हें पुकारा। उन्होंने कुछ उत्तर दिया या नहीं कीर्तनकी ध्वनिमें न जाना जा सका। कीर्तनसे लौटकर वैष्णवोंने ठाकुरको खीरका भोग लगाया। जब उन्हें प्रसाद देने गये तो देखा कि उन्होंने आसनपर बैठे-बैठे ही देह त्याग दिया है। वे जान गये कि उन्होंने उस शरद-पूर्णिमाकी रात्रिमें रासमें प्रवेश पा लिया।

नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश

नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।

कथा का सार

श्रीहरेकृष्णदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।