ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 17
श्रीहंसदासबाबाजी एवं श्रीगोपालीबाई
श्रीहंसदासबाबाजी एवं श्रीगोपालीबाई की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीहंसदासबाबाजी एवं श्रीगोपालीबाई का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ विलासगढ़, बरसाना ]
वृन्दावनमें धोबी गलीमें दतियाकुञ्जकी एक कुटीमें श्रीगोपालदास बाबा रहा करते। बड़े ही विरक्त और प्रभावशाली महात्मा थे वे। श्रीमद्भागवत महापुराण, रामायण और भक्तमाल आदिकी बड़ी सुन्दर कथा कहते। उनकी वाणीमें तेज था। उसके प्रभावसे न जाने कितने लोगोंके जीवनमें चमत्कारी परिवर्तन हुआ, कितने इंतों तकका उद्धार हुआ। वृन्दावनके किसी-न-किसी स्थानमें उनकी कथा नित्य हुआ करती। किसी संभ्रान्त परिवारकी आभूषणोंसे लदी एक २०-२२ वर्षीया युवती भी उनकी कथा सुनने जाने लगी।
गोपालदास बाबा अन्धे हो चुके थे। कथाके समय कोई ग्रन्थ पढ़ता था, वे व्याख्या करते थे। एक दिन कथा समाप्त होनेके पश्चात् उन्होंने पूछा- यह
किसके घरकी बाई थी, उसके नूपुरोंकी ध्वनि कानमें आ रही थी ?'
किसीने उत्तर दिया- 'वह हंसराजकी पत्नी थी।'
दूसरे दिन कथा कहते समय किसी प्रसंगमें उन्होंने कहा-गहना बेचो साधु जिमाओ, यह तन दुःखको भांडो ।
जनम जनम गधेया होगी, राम भजो री रांडो ।।
यह सुन स्त्रियाँ हँस पड़ीं। किसी-किसीने कहा- 'बाबा बूढी हय गयी, तऊ गाली देबे।' पर, अन्तरयामी बाबाने जिस असाधारण संस्कार-संयुक्ता महिलाके अन्तरभावको उद्दीप्त करनेके उद्देश्यसे यह बात कही थी, उसके मर्मस्थलको वह स्पर्श कर गयी। वह घर जाकर हंसराजसे बोली- 'मैं जिन महात्माकी कथा सुनने जाती हूँ उनसे दीक्षा लूँगी। गहने बेचकर साधू-सेवा करूँगी। विरक्त हो इस नश्वर देहको निरन्तर भजनमें नियुक्त कर जीवन सार्थक करूँगी। आप भी ऐसा ही
करें। हंसराजजीने कहा- 'गोपालदास बाबा सब प्रकारसे गुरु बनाने योग्य हैं। हम दोनों उनसे दीक्षा लेंगे, पर भजन गृहस्थमें रहकर ही करेंगे। तुम्हारी छोटी अवस्था है। विरक्त होकर अकेले रहना तुम्हारे लिए ठीक नहीं।
पर पत्नी न मानी। उसका संकल्प दृढ़ था। वह नित्य विरक्त-वेश ग्रहण करनेके लिए हंसराजजीके पीछे पड़ी रहती और बिहारीजीसे प्रार्थना करती- 'प्रभु, या तो मुझे दुनियासे उठा लो, या मेरे पतिका मन फेर दो।'
हंसराजजी बड़े धर्म-संकटमें पड़ गये। भक्ति-भाव तो उनका भी कुछ कम न था। लखनऊके निकट काकोरीमें एक धर्मनिष्ठ अस्थाना कायस्थ परिवारमें सन् १८५९ में उनका जन्म हुआ था। जन्मसे ही उनमें भगवद्भक्तिके प्रबल संस्कार थे। युवावस्थामें वृन्दावनमें रहकर भजन करनेके उद्देश्यसे वे सपत्नीक वृन्दावन चल आये थे। जीविका उपार्जनके लिए लालाबाबूके मन्दिर में नौकरी कर ली थी। यह स्थिति उन्हें भजनके लिए सर्वथा अनुकूल जान पड़ती थी।
एक दिन वे मन्दिरकी ओरसे नन्दगाँव और बरसानेके बीच संकेत में किसी ग्वारियेके घर मन्दिरकी जमीनका लगान वसूल करनेके उद्देश्यसे कुड़की लेकर गये। उसका सारा सामान कुड़क कर लिया। उसके साथ उसकी लड़कीका जेबर भी कुड़क कर लिया। घरके बाल-बच्चे और स्त्रियाँ सब रोने लगे। ग्वारियेकी लड़की रोती हुई हंसराजजीके पास आकर बोली- 'पिताजी, मैं तो बापसे मिलने मैके आयी थी। अब घर जाकर क्या मुँह दिखाऊँगी।'
यह दृश्य हंसराजजीसे न देखा गया। बिहारीजीकी कृपासे उन्हें एक नयी प्रेरणा मिली। उनका मन संसारसे फिर गया। उन्होंने कुड़क किया हुआ सारा सामान बारियेको लौटा दिया। उसी दिन मन्दिर जाकर इस्तीफा दे दिया। चार्ज देते-देते शतके ११ बज गये। घरपर पत्नी चिन्तामें बैठी बिहारीजीसे प्रार्थना कर रही थी। संकल्पके अनुकूल व्यवस्था करनेके उद्देश्यसे एक लीला रची है, जिसके कारण वह क्या जानती थी कि बिहारीजीने उसकी प्रार्थना सुन ली है और उसके शुभहहै आज उसके पतिको घर लौटनेमें देर हो रही है ?
घर लौटकर हंसराजजीने पत्नीसे कहा- 'मैं नौकरीसे इस्तीफा दे आया हूँ। कल हम दोनों संसारसे भी इस्तीफा देकर वैराग्य-वेश धारण करेंगे।'
पत्नीकी खुशीका ठिकाना न रहा। वह 'जै बिहारीजीकी!' कहकर आनन्दाश्रु विसर्जन करने लगी।
दूसरे दिन पति-पत्नीने गोपालदास बाबाजीके, पास जाकर अपनी इच्छा प्रकट की। बाबाने कहा- 'अभी तुम लोगोंकी उम्र थोडी है। अच्छा होगा कि तुम घरपर रहकर ही भजन करो।'
पर, जब देखा कि दोनोंमें से कोई इससे सहमत नहीं है और दोनोंका निश्चय दृढ़ है, तब उन्होंने दोनोंको विरक्त-वेष दे दिया। पतिका नाम रखा 'हंसदास', पलीका 'गोपालीबाई'। हंसदासको बरसानेमें साँकरी खोरके पास विलासगढ़में रहकर भजन करनेकी आज्ञा दी और गोपालीबाईको गोवर्धन में हाथी दरवाजेके निकट एक कोठरीमें रहकर भजन करने की।
गोपालीबाईने अपने सब गहने बेचकर साधु-सेवा कर दी। स्वयं गोवर्धन नाकर मधुकरी वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हुए भजन करने लगीं।
हंसदासजीके पिताने जब सुना कि उनके पुत्र और पुत्र-बधू दोनोंने विरक्त-वेश धरण कर लिया है, तो वे भागे वृन्दावन आये। वे स्वयं भी भक्तिभाव सम्पन्न तो थे है, गोपालदास बाबाजीके दर्शन कर उनके रंगमें रंगे बिना न रह सके। गोपालदासजीसे विरक्त वेश ले उनकी आज्ञासे संकेतमें भजन करने लगे। उनका नाम हुआ श्रीराधिकादास ।
गोपालीबाईके पिता लखनऊमें मैजिस्टेट थे। जब उन्हें पता चला कि उनकी लड़की, जमाई और समधी तकको किसी साधूने बाबाजी बना दिया है, तो वे
कोधसे आग-बबूला हो गये। वृन्दावन जाकर उन्होंने गोपालदास बाबाजीको बहुत-सौ खरी-खोटी सुनायी और जेल भेजनेकी धमकी दी।
बोले- 'मैजिस्ट्रेट साहब, मुझे आप जेल अवश्य भेज दें। मेरे लिए तो संसार भी जेल ही है, बल्कि इस जेलसे वह जेल अच्छी है: क्योंकि यहाँ माँगकर खानी पड़ती है. वहाँ बिन माँगे मिल जाती है। पर, आपका मेरे ऊपर क्रोध उचित नहीं। आपका काम है लोगोंको जेल भेजनेका, मेरा काम है जेलसे उन्हें छुडानेका । संसार रूपी जेलमें हम सब अनादिकालसे बन्दी हैं और तरह-तरहकी यातनाएँ भोग रहे हैं। जिस दिन आप यह भली प्रकार जान लेंगे आपका भी दृष्टिकोण बदल जायेगा और आप भी संसाररूपी जेलमें अपनेको बन्दी मान अपनी लडकी और जमाईकी तरह बाबा निर्विकार भावसे चुपचाप सुनते रहे। जब वे कुछ शान्त हुए तब हँसकर उससे छुटकारा पानेको सचेष्ट हो जायेंगे।
भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग
'संसार-बन्धनका कारण मोह है। मोहके कारण ही मनुष्य पिता-पुत्र, बहू-बेटी और जमाई आदिसे अपना नित्य जैसा सम्बन्ध मान लेता है' फिर सहसा उनसे विच्छेद होनेपर दुःखी होता है. क्रोध करता है। आपकी बेटी और जमाईका मोह अब जाता रहा है, पर आपका मोह बना हुआ है। इसलिए उन्हें आपसे सम्बन्ध तोड़नेमें दुःख नहीं हुआ, आपको हो रहा है। सांसारिक सम्बन्ध रेलगाड़ीके एक हो डिब्बेमें बैठे यात्रियोंके बीच सम्बन्धक समान क्षणिक है। जब जिसकी यात्रा समाप्त होती है वह रेलगाड़ीसे उतर पड़ता है। डिब्बेमें बैठे दूसरे यात्रियोंका इसपर आपति करनेका कोई अधिकार या औचित्य नहीं होता। जिन्हें आप अपनी बेटी और जमाई मानते हैं, उनकी रेलयात्रा समाप्त हो चुकी है। वे अपने गन्तव्य स्थानके निकट पहुँच चुकनेके कारण गाड़ीसे उतर पड़े हैं।
यथार्थ बात यह है, इसलिए आपके क्रोध करनेका कोई कारण नहीं है।
'सांसारिक सभी जीव रेलगाड़ीमें बैठे उन उन्मादग्रस्त यात्रियोंके समान हैं, जो बिना टिकट गाड़ीपर बैठ लेते हैं और जिन्हें पता नहीं होता वे कहाँ जा रहे हैं। कालरूप टी.टी. आकर उन्हें जहाँ इच्छा होती है धक्का देकर उतार देता है, या जेल भेजनेके लिए सिपाहियोंके सुपुर्द कर देता है। प्रभुकी कृपासे या महत् संगसे जिनका उन्माद जाता रहता है, वे गाडीसे उतर पडते हैं और टी.टी. के धक्कोंसे बचे रहते हैं। फिर उन्हें जहाँ जाना चाहिये उस ओर चल देते हैं। मैं भगवानसे प्रार्थना करता हूँ कि वे आपका भी मोह दूरकर आपको उस पथका पथिक बनाये जिसपर चलकर आप वास्तविक सुख-शान्ति लाभ कर सकते हैं।
मैजिस्ट्रेट साहबने बाबाको मुलजिम जानकर उनके प्रति अपशब्द कहे थे। उन्होंने पहले भी बहुत-से मुलजिमोंपर डाँट-डपट की थी, पर किसीने इतनी विर्भीकतासे अपनी सफाई पेश नहीं की थी। किसीने सफाई पेश करते हुए उल्टे उन्हें अपराधी रूपमें कारागारमें पड़े रहकर अनंतकालसे सजा भोगते रहनेका अहसास नहीं कराया था। बाबाकी वाणी उनके हृदयाकाशमें बिजलीकी तरह कौंध गयी। उनका मोहान्धकार छूट गया। संसार एक कारागार है, यह उन्हें स्पष्ट दीख दया। बाबाके प्रति द्वेषका भाव अलक्षित रूपसे कुछ-कुछ श्रद्धामें परिणत हो गया। उन्होंने कुछ दिन और वृन्दावनमें रहकर उनका सत्संग करनेका निश्चय किया।
कई दिन लगातार बाबाकी कथा सुनने और उनका संग करनेके पश्चात् उनके उदयमें भी ऐसा परिवर्तन हुआ कि एक दिन वे उनके चरणोंमें गिरकर अपने नयन-उनसे उन्हें अभिशिक्त करते हुए बोले- 'बाबा, मैंने आपके चरणोंमें बड़ा अपराध किया है। मुझे क्षमा करें और मेरे ऊपर भी ऐसी कृपा करें, जिससे भाव-बन्धनसे मेरी मुक्ति हो और राधाकृष्णके चरण कमलोंकी प्राप्ति हो।'
बाबाने उनपर भी कृपा करनेमें देर न की। वे भी बाबासे दीक्षा ग्रहणकर भजनमें जुट गये। व्रजमें यह सारी घटना एक परिवारके सभी सदस्योंके वैराग्य, तितिक्षा और भजनाग्रहकी अभूतपूर्व मिसाल बनकर रह गयी।
गोपालीबाई गोवर्धनमें कठोर वैराग्य धारण कर भजन करने लगीं। महावाणीकी वे बड़ी रसिक थीं। नित्य प्रेमसे महावाणीका पाठ करतीं और गोपाल-मन्त्रका जप करतीं। जप करते-करते उन्हें गोपाल-मन्त्र सिद्ध हुआ, और श्यामा-श्यामके दर्शन हुए। एक दिन किसी कामी पुरुषकी उनपर दृष्टि पड़ी। अवसर देखकर उसने अकी कुटीमें प्रवेश करना चाहा। सोचा कि इस समय यहाँ और कोई है नहीं जो बाधा दे। पर, वह मूर्ख क्या यह जानता था कि भक्तवत्सल प्रभु स्वयं किसी-न-किसी रूपमें उनके निकट अपने भक्तोंकी रक्षाके लिए सदा रहते हैं ? वह जैसे ही कुटरीके दरवाजेके पास पहुँचा, उसने देखा कि एक सिंह दहाड़ता हुआ उसकी ओर अग्रसर हो रहा है। उसकी दहाड़ सुनते ही वह मूर्छित हो गिर पड़ा।
इस घटनाके पश्चात् गोपालीबाईके रहनेकी व्यवस्था बाबा हंसदासजी के शिष्य श्रीलाडलीदासजीके मकानकी एक कोठरीमें कर दी गयी। शेष समयतक वे उसमें भजन करती रहीं।
बाबा हंसदासजी बरसानेमें मधूकरी वृत्तिसे रहकर भजन करते। कभी-कभी गुरुदेवके पास वृन्दावन जाते। गुरुदेवसे उन्होंने भक्तमाल और भागवतका अध्ययन किया।
उनकी बडी इच्छा थी भागवत कण्ठस्थ करलेने की। पर यह कोई सहज काम अपरिचित बालिकाने उनसे कहा- 'बाबा, मुख खोल ।' उन्होंने मन्त्र-मुग्धवत् मुख तो था नहीं। इसके लिए वे श्रीजीसे प्रार्थना करने लगे। एक बार एक भोली-भाली खोल दिया। बालिकाने जिह्वापर कुछ लिख दिया। लिखते ही उन्हें विचित्र प्रकारका प्रेमावेश हुआ, जिसमें रोदन करते-करते आँख लग गयी। स्वप्नमें श्रीजीने कहा- 'जा तेरी जिह्वापर मैने लिख दिया। तुझे भागवत् कण्ठ हो जायेगी।' तभीसे उन्हें भागवत् कण्ठस्थ हो गयी।
पण्डित रामकृष्णदास बाबासे उन्होंने व्याकरण पढी। फिर गुरुजीकी आज्ञासे भागवत और भक्तमालकी कथा कहना प्रारम्भ किया। उनकी कथा बडी रसमयी होती। भागवत सप्ताहकी कथा भी वे कहा करते। पर सप्ताहकी कथा जहाँ भकहते, वहाँ उसके आयोजकोंसे तय कर लेते कि जितने लोग नियमपूर्वक कथा सुनेंगे उन सबकी कथाकी समाप्तिपर भरपेट प्रसाद द्वारा सेवा करनी होगी। कथाने जो भी भेंट आती उसे वे साधुओंमें बाँट देते। स्वयं परमहंस वृत्तिसे रहते। पैस स्पर्श भी न करते।
भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति
गुरुदेवका चलाया श्रीनिम्बार्काचार्यका उत्सव वे बड़ी धूम-धामसे मनाते। दिग्विजयी श्रीकेशवकश्मीरीका उत्सव उन्होंने स्वयं चलाया। इन उत्सवोंको मनाने वे बरसानेसे वृन्दावन खाली हाथ आते, पर उनके आते ही सब सामग्री और कार्यकर्ता अपने आप जुट जाते। उत्सवके पश्चात् वे जैसे खाली हाथ आते वैसे खाली हाथ चले जाते।
हंसदास बाबा निम्बार्क-सम्प्रदायके अन्तरभुक्त होते हुए भी सभी सम्प्रदायोंके महात्माओंका संग करते। गौड़ीय-सम्प्रदायके पण्डित रामकृष्णदास बाबा, श्रीगौरांगदास बाबा और श्रीअवधदास बाबा, निम्बार्क सम्प्रदायके श्रीमाधवदास बाबा और श्रीदुलारेप्रसादजी, हरिदासी सम्प्रदायके भक्तमाली श्रीजगन्नाथजी और शुक् सम्प्रदायके रसिक-सन्त श्रीसरसमाधुरी शरणजीसे उनका निकटका सम्बन्ध था। जैसे वे सभी सम्प्रदायके महात्माओंका संग करते, वैसे ही उनके पास सगके लिए सभी सम्प्रदायके महात्माओंका संग करते, वैसे ही उनके पास सगके लिए सभी सम्प्रदायोंके लोग आया करते। श्रीसरसमाधुरी शरणजी उनके उत्सवोंमें जयपुरसे पधारा करते। वे सभी के प्रति प्रेमका व्यवहार करते।
सब यही समझते कि बाबा जितना उनसे प्रेम करते हैं, उतना शायद किसी औरसे नहीं करते। जो भी उनके पास आता उससे पहले कहते- 'भूख लगी होगी। कुछ खा लो।' यदि वह मना करता तो आग्रह करते और कुछ-न-कुछ खिला देनेकी चेष्टा करते।
जैसा वे मनुष्योंसे प्रेम करते वैसा ही पशु-पक्षियोंसे भी। विलासगढ़में एक विशाल सर्फ रहा करता। बाबा जब मध्याह्नके पश्चात् विलासगढकी गुफासे बाहर निकलकर शिलापर विराजते तो वह सर्प भी निकल आता और उनके सान्निध्यका सुख लेता. कभी-कभी उनके चरण भी चाट लेता। उनके युवा शिष्य श्रीवंशीदासजीको उसे देख भय लगता। उनहोंने एक दिन उसकी बांबीपर शिला रख
दी। दूसरे दिन सर्पके न दीखनेपर बाबाने कहा- 'आज नागराज नहीं आये।' किसीने कहा- ' बंशीदासने उनकी बांबीपर शिला रख दी है।'
रुष्ट होकर बाबा बोले- 'बंशीसे कहो ऐसा न किया करे। नागराजके घरमें
हम रहते हैं, हमारे घरमें वे नहीं।'
बाबा मानसी सेवामें सिद्ध थे। कई बार देखा गया कि जब वे अपनी गुफा में बैठे भजन करते होते, उस समय श्रीजीके मन्दिरमें जो भोग लगता उसे जान लेते। एक बार उन्होंने श्रीजीके लिए पोशाक बनावायी। उसे लेकर मन्दिर जाने लगे। साँकरी खोर पार करते ही एक आठ वर्षीया सुन्दर बालिका आते दिखी। उनके निकट आकर लोभ भरी दृष्टिसे पोशाकको देखते हुए बोली-'बाबा, याय कहाँ लै जाय रह्यौ है ? मोय दै दे' और इतना कहकर पोशाक बाबाके हाथसे लेकर चल दी। बाबा देखते रह गये। पर उसके स्पर्श मात्रसे उनके अंग-प्रत्यंगमें एक दिव्य आनन्दकी नहर दौड़ गयी। भाव-विभोर अवस्थामें डगमगाते-डगमगाते जब वे मन्दिर पहुँचे, तो श्रीजीको वही पोशाक पहने देख चकित रह गये। मन-ही-मन कहने लगे - 'धन्य है लाड़ली ! तुम्हें इतना भी सबर न हुआ।
आधे रास्तेसे ही पोशाक छीनकर धारण कर ली!' भला लाड़लीको सबर कहाँ ? वे तो प्रेमीके उपहारको उसके देनके संकल्पके साथ ही लेनेको उतावली हो पड़ती हैं। यही तो है उन प्रेममयीके भक्तवत्सल स्वरूपकी विवशता, जिसपर उनका कोई नियन्त्रण नहीं।
हंसदासजीका शुक सम्प्रदायके रसिक सन्त श्रीसरसमाधुरी शरणजीसे बड़ा सेह था। वे उनके स्नेहपूर्ण आग्रहपर अकसर जयपुर और अलवरके निकट शुक सम्प्रदायके आचार्य श्रीश्यामचरणदासजी महाराजके जन्म-स्थान डहरामें जाकर श्रीमद्भागवतकी कथा कहा करते।
सरसमाधुरीजीके धाम पधारनेके पश्चात् एक बार जब हंसदास बाबा लगभग ७८ वर्षके थे, उनहें श्रीसरसमाधूरी शरणजीके पुत्र श्रीरसिकमाधुरी शरणजी
(श्रीराधेश्याम शरणजी) श्रीशुकदेवजीके जन्मोत्सवपर कथा कहनेके लिए जयपुर जा रहे थे। अछनेरामें उन्हें इतना तेज बुखार आया कि वे बेहोश हो गये। होगा ? उस समय बेहोशीकी अवस्थामें ही वे एकाएक बोल पडे- 'राधे, तू के राधेश्यामजी चिन्ता करने लगे-कहीं इनका शरीर व्रजके बाहर छूट गया तो क रह्यौ है बाबाको शरीर छूट गयो तो काऊको कहा मुख दिखारावैगो । चिन्ताम करे। मैं मरूंगो नाँय। शुकदेवजीको कथा सुनायके आऊँगो।'
ऐसा ही हुआ। उनहोंने जयपुरमें कथा कही ऐसी भावपूर्ण कथा जिसे लोग आज तक याद करते हैं। वहाँसे स्वस्थावस्थामें लौटे। कुछ दिन बाद सन् १९३७में वृन्दावनमें पार्थिव शरीर को छोड़ निकुञ्ज पधारे।
उन्होंने कई ग्रन्थोंकी रचना की, जो इस प्रकार हैं-
(१) सिद्धान्त-रतनाञ्जली (टीका), (२) चतुः सम्प्रदाय-सिद्धान्त, (३) कृष्ण-सिद्धान्तसार, (४) राधारहस्य प्रकाशिका, (५) गोदना-लीला (पद्य), (६) निम्बार्क-प्रभा (निम्बार्की सन्तोंका सक्षिप्त जीवन-चरित्र)।
हंसदासजीके प्रधान शिष्य श्रीबालगोविन्ददासजी भी उन्हीके समान एक प्रचुर भक्ति-भावसम्पन्न और परम विरक्त सन्त थे। उन्होंने वृन्दावनमें निम्बार्ककोटको स्थापना की और वहाँ उन सभी उत्सवोंके निरन्तर मनाये जानेका प्रबन्ध कर, जिरे उनके गुरुदेव मनाया करते थे, जन-कल्याणके लिए उनकी पुण्य-स्मृति सदा जागादे रखनेकी व्यवस्था की।
नाम-स्मरण और एकाग्रता — जीवन-संदेश
नाम-स्मरण, भजन और एकाग्रता के प्रसंग साधना की निरंतरता की याद दिलाते हैं। यहाँ वर्णित जीवन-अनुभवों से पाठक अपनी साधना के लिए प्रेरणा ले सकते हैं।
कथा का सार
श्रीहंसदासबाबाजी एवं श्रीगोपालीबाई की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।