ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 10
श्रीगिरिजादेवी
श्रीगिरिजादेवी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीगिरिजादेवी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
व्रजगोपिकाओंमें श्रीकृष्ण-प्रेम स्वतः सिद्ध था। उनहोंने जब श्रीकृष्णको देखा भी नहीं था, उनके विषयमें कुछ सुना भी नहीं था, तब भी उनका हृदय श्रीकृष्ण-प्रेमसे परिपूर्ण था। उज्ज्वल नीलमणिमें उनके स्वतः सिद्ध श्रीकृष्ण-प्रेमका एक उदाहरण देते हुए श्रीरूप गोस्वामीने ललिताके प्रति राधाकी एक उक्तिका उल्लेख किया है। राधा कहते हैं- 'हे सखी! जिसे मैंने कभी देखा नहीं, जिसके विषयमें कभी कुछ सुना नहीं, जिसके समान त्रिजगत्में किसी व्यक्तिके होनेकी संभावना भी मेरे मनमें कभी जागी नहीं, ऐसे एक घनश्यामल, पीताम्बरधारी व्यक्तिको रमणरूपमें इसौ गोष्ठमें वरण करनेके लिए मेरा मन न जाने क्यों व्यर्थ ही व्याकुल रहता है !"
प्रकट लीलामें श्रीकृष्णकी नित्य कान्ताओंके इस प्रकारके नित्य-सिद्ध श्रीकृष्ण-प्रेमसे जीवकोटिके किसी व्यक्तिके श्रीकृष्ण-प्रेमकी तुलना करना समीचीन
श्रीमृत्युंजयप्रसाद सिंहकी पत्नी श्रीमती गिरिजादेवीके प्रेमके सम्बन्धमें कहा जाय कि नहीं। पर, यदि बिहारके आरा जिलेके अन्तर्गत जमीराके क्षेत्रीय जमींदार उनमें इसका कुछ अभास था, तो अत्युत्ति न होगी। वे एक बहुत बड़े जमींदारकी अत्यधिक प्रिय पत्नी होनेके अतिरिक्त दो अति सुन्दर लड़कोंकी माँ थीं। उनकी दो लिए अनेक बांदियाँ थीं, जो पीनेको एक गिलास पानी भी उन्हें स्वयं नहीं लेने देती भाग्यशाली लडकियाँ भी थीं, जो अच्छे घरोंमें ब्याही गयी थीं। उनकी सेवा-सुश्रूषाके सन्तान और अच्छा स्वास्थ्य आदि सांसारिक जितनी भी वस्तुओंकी कोई स्त्री थीं। वे जमीराकी रानी कहलाती थीं। धन-सम्पति, सुहाग, मान-मर्यादा, अच्छी कामना कर सकती है. वे सब उन्हें प्रचुर मात्रामें प्राप्त थीं। फिर भी वे संसारसे उदासीन थीं।
वे जानती थीं कि सांसारिक सुख-सम्पत्ति, पति, पुत्रादि अस्थायी हैं।
उनके प्राण किसी अदृश्य, अज्ञात पुरुषकी ओर खिंचते रहते थे, जो परम सुन्दर, परम सत्य, परम सुखमय और परम प्रेममय है और जिससे उनका जन्म-जन्मका सम्बन्ध है। उसकी यादमें उनका प्रेम-समुद्र सदा उद्वेलित होता रहता था। उनके नेत्र सदा सजल रहते थे। बीच-बीचमें वे दीर्घ निःश्वासके द्वारा अपनी आन्तरिक वेदनाको हलका करनेकी चेष्टा करती रहती थीं। अकसर एकान्तमें छिपकर फूट-फूटकर रो लिया करती थीं।
गिरिजादेवीका बड़ा लड़का जब १८ वर्षका हुआ, उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ ही दिन बाद उनका दूसरा लड़का भी चल बसा। एक ही वर्षमें दोनों पुत्रोंको खो देनेके कारण उनकी संसारमें जो थोड़ी-बहुत आसक्ति थी, वह भी जाती रही। उनकी चित्तवृत्ति और भी अन्तरमुखी हो गयी। वे संसारमें रहते हुए भी उसमें न रहती-सी जान पड़ने लगी। उन्हें खाने-पहनने की भी सुध न रहती। बांदियाँ खाना खिलातीं तो खा लेतीं, कपड़े पहनाती तो पहन लेतीं, स्नानादि करातीं तो कर लेतीं। पर ऐसा लगता कि जैसे यह सारी क्रियाएँ उनके बिना जाने यन्त्रवत् होती हों और वे स्वयं अन्तर्जगत्के किन्हीं कुञ्जों, निकुञ्जों, वनों और वीथियोंमें खोई रहती हों।
उनकी यह अवस्था देख मृत्युंजयप्रसाद सिंहको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने अपनी चिन्ता कुलगुरुसे व्यक्त की। कुलगुरुने गिरिजाजीको श्रीमद्भागवतका पाठ सुनाना प्रारम्भ किया। पाठ सुनते-सुनते उन्हें यह ज्ञात हो गया कि वह अज्ञात और अदृष्ट पुरुष, जिसके लिए उनके प्राण सदा रोया करते थे, कौन हैं ? तभी श्रीकृष्णमें उनकी अनन्य निष्ठा और भक्तिका उदय हुआ। एक दिन पाठ सुनते-सुनते उन्हें श्रीकृष्णके दर्शन हुए और वे मूच्छित हो गयीं। श्रीकृष्ण दर्शनके पश्चात् श्रीधाम वृन्दावन जानेके लिए उनका मन छटपटाने लगा।
श्रीगिरिजादेवी वृन्दावनधामके दर्शन मात्र करना चाहतीं, तो कोई ऐसी बात नहीं थी, पर वे तो वहाँ मृत्युञ्जयप्रसादके लिए अब एक और संकट उत्पन्न हो गया। यदि गिरिजाजी जाकर बस जाना चाहती थीं। वहाँ जाकर श्रीकृष्णको अपना तन-मन सदाके लिए अर्पण कर देना चाहतीं थीं। यह कैसे हो सकता था ? सब प्रकारकी सुख-सुविधाओंके जिस परिवेशमें वे जमीरामें अपने महलमें रहती थीं, वह क्या वृन्दावनमें उपलब्ध हो सकता था ? फिर कुलके गौरव और मान-मर्यादाकी भी तो बात थी। कुलकी मर्यादाके अनुसार वे आज तक कभी
परदेसे बाहर नहीं हुई थीं। अब यदि वे उन्हें घर-द्वार छोडकर अकेले वृन्दावन जाकर रहनेकी अनुमति दे देते, तो कुलकी मर्यादा धूलमें न मिल जाती ?
पर दूसरा कोई विकल्प भी तो नहीं था। उनकी इस समय जैसी स्थिति थी, उसमें उन्हें उनकी इच्छाके विरुद्ध घरपर बाँध रखना भी सम्भव नहीं था। यह सोच-विचारकर अन्तमें उन्होंने उन्हें वृन्दावन जानेकी अनुमति दे दी।
वृन्दावन जाकर वे राधारमणजीके घेरेमें श्रीराधारमणजीके मन्दिरके पीछे श्रीराधारमणजीके सेवाइत श्रीनीलमणि गोस्वामीके मकानमें किरायेपर रहने लगीं। तभीसे राधारमण उनके साथ आँख मिचौली खेलने लगे। वे उन्हें कभी प्रत्यक्षमें, कभी स्वप्नमें दर्शन देकर अन्तर्धान हो जाते, कभी किसी आविष्ट व्यक्तिके अन्तरालमें रहकर उसके माध्यमसे उनसे बातें करते। राधारमणके सेवाइत श्रीहरी गोस्वामीको उन्होंने अपना तीर्थगुरु मान लिया था। अनेकों बार उनके माध्यमसे इस प्रकारकी लीला होती। वे अपने घरपर बैठे-बैठे एकाएक आविष्ट हो जाते। आविष्ट अवस्थामें गिरिजाजीके पास जाते। उनसे बाते करते, उन्हें उपदेश देते और लौट आते। उनका आवेश छूटता, तब उन्हें इस बातका कुछ भी पता न रहता कि वे उनके पास क्यों गये और क्या कह आये।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
कभी-कभी उनसे बातें करते-करते उनका वह आवेश छूट जाता। तब वे अचानक अपने आपको उनके पास पाकर चकित और संकुचित होते। आविष्ट अवस्थामें वे नहीं, श्रीराधारमण ही उनसे बातें किया करते। गिरिजादेवीजी यह जानतीं और वे जैसा भी आदेश-निर्देश देते, उसके अनुरूप कार्य करतीं।
पर, उन्हें श्रीराधारमणकी इस प्रकार अन्तरालमें रहकर उनसे बातें करना, या दर्शन देना और छिप जाना अच्छा न लगता। इससे उनका विरह और तीव्र हो जाता और वे उनके प्रति तरह-तरहके आक्षेप करने लगतीं।
से महके द्वारा श्रीकृष्ण नामका जप किया करतीं। श्रीकृष्णके इस प्रकार के व्यवहारसे रुष्ट हो उन्होंने एक दिन उनका नाम न लेकर केवल श्रीराधाका मकान मालिक श्रीनीलमणि गोस्वामीजी गिरिजादेवीजीके निकट ही अपने दूसरे नाम लेनेका निश्चय किया। उसी दिन श्रीकृष्णने एक विशेष लीला की। उनके लगे 'आरेवाली बीबीजीको बुलाओ, आरेवाली बीबीजीको बुलाओ।' उनकी पत्नी मकानमें रहते थे। वे बीमारीकी अवस्थामें प्रलाप करते हुए चीख-चीखकर कहने जाकर उन्हें बुला लायीं। उनके आते ही गोस्वामीजी उनका हाथ पकड़कर बोले- 'तुम मुझे छोड़ दोगी ?'
गिरिजादेवीजी भौचक्की-सी उनकी ओर देखने लगीं। उनकी कुछ समझमें न आया कि गोस्वामीजी क्या कह रहे हैं ? उन्होंने फिर कहा- तुम अब मेरा नाम न लोगो ? राधाका ही नाम लोगी। बताओ क्या सचमुच मुझे छोड दोगी ? कहो नहीं कोईगी।
तब वे समझीं कि उनके माध्यमसे कौन बोल रहा है। नेत्रोंमें आँसू भरते हुए उन्होंने कहा- 'नहीं छोड़ेंगी।' उसी क्षण गोस्वामीजीका आवेश छट गया। वे बोले- 'आपने क्यों कष्ट किया बीबीजी ?
आप ही ने तो बुलाया था।' गिरिजादेवीजीने कहा।
'मैंने तो नहीं बुलाया।'
गिरिजादेवीजी और क्या कहतीं ? उन्हें दण्डवत्कर चली आयीं।
गिरिजादेवीजी अपने भावको गुप्त रखती। उन्हें देख किसीके लिए यह अनुमान लगाना मुश्किल होता कि वे एक परम भक्तिमती महिला हैं। वे हुक्का पीतीं। साधु-महात्मा भी उनके पास आते रहते। उनके बीच उन्हें बैठी देख कुछ लोग उनके सम्बन्धमें तरह-तरहकी शंकाएँ करते। श्रीराधारमणके एक सेवाइत गोस्वामी श्रीरमाकान्तजीको भी उनके प्रति इसी कारण अश्रद्धा थी।
परन्तु, भक्त कितना भी अपने-आपको छिपाकर रखे, यदि भगवान् स्वयं उसकी महिमा प्रकट करना चाहें, तो वह कब तक छिपा रह सकता है। एक बार जब राधारमणजीके मन्दिरमें श्रीरमाकान्त गोस्वामीजीकी सेवा चल रही थी, वे किसी कार्यवश मथुरा गये। सेवा-कार्य किसी दूसरे गोस्वामीको सौंप गये। मथुरासे रात १२ बजे लौटे। उन्होंने देखा कि गिरिजादेवीजी और कुछ अन्य गोस्वामीगण उनके आगमनकी प्रतीक्षामें उनके दरवाजेपर बैठे हैं। उन्हें देखते ही गोस्वामीगण बोले- 'आज आपकी सेवामें बड़ी त्रुटि हो गयी।'
'कैसी त्रुटि ?'
'श्रीजीकी सेवामें शयनके समय पानीका करुआ नहीं रखा गया।'
'क्या ? ऐसा तो नहीं होना चाहिये। आपको कैसे पता ?'
'श्रीजीने इन बीबीजीसे जाकर इस बातकी शिकायत की है।'
'क्यों बीबीजी ?' रमाकान्तजीने गिरिजादेवीजीकी ओर विस्मय और सन्देहके भावसे देखते हुए पूछा।
उन्होंने कहा- 'हाँ महाराज। मुझसे उन्होंने कहा- मैं बहुत प्यासी हैं।'
रामाकान्तजीको फिर भी विश्वास न हुआ। कहीं हुक्का गुड़गुड़ानेवाली, पुरुषोंके बीच बैठकर गप्प करनेवाली बीबीजीके श्रीजी इतना निकट हो सकती है कि वे अपने दुःख-दर्दकी बात उनसे जाकर कहें ? पर, वे इस बातको टाल भी नहीं सकते थे. क्योंकि पूर्वमें एक बार ऐसी ही घटना घट चुकी थी, जब राधारमणजीने टटिया-स्थानके महन्त श्रीललितकिशोरीजीसे जाकर इसी प्रकार की शिकायत की थी। उन्होंने उसी समय स्नानकर मन्दिर में प्रवेश किया, तो देखा कि सचमुच श्रीजीके पास पानीका करुआ नहीं रखा गया था।
एक बार श्रीनीलमणि गोस्वामीके मनमें बात आयी कि गिरिजादेवीजी बहुत दिनोंसे उनके मकानमें थोड़े किरायेपर रह रही हैं। किसी प्रकार उनसे मकान खाली कराकर किसी औरको अधिक किरायेपर उठा दिया जाय। राधारमणजीको यह बात अच्छी न लगी। उन्होंने ऐसी लीला रची कि उसी दिन कुछ देरके लिए उनका अपना ही सपरिवार अपने घरसे निष्कासन हो गया। वे उस दिन घरके सभी लोगोंको लेकर कहीं बाहर गये और घरका ताला बन्दकर गये। लौटकर आये तो ताली पासमें होते हुए भी ताला न खोल सके। बहुत देर हो गयी गलीमें खड़े-खड़े तालेसे नूझते, पर ताला टस-से-मस न हुआ। दूसरे लोगोंने ताला खोलनेका प्रयास किया। वे भी असफल रहे। ताला न खुलनेका कारण किसीकी समझमें न आया। गिरिजादेवीजीके मकानके नीचे एक कमरेमें रामपुरवाली एक भक्त महिला रहती थीं।
उन्हें राधारमणजीकी इच्छासे प्रेरणा हुई कि गिरिजादेवीजीके प्रति नीलमणिजीका कुछ अपराध हुआ है। यदि नीलमणिजी उनसे ताला खोलनेको कहें, तो खुल सकता है। उन्होंने नीलमणिजीसे यह बात कही। नीलमणिजीने मन-ही-मन सोचा 'बात तो यह ठीक कह रही हैं। मैंने आज उनसे घर खाली करानेकी बात मनमें लाकर
जीवन के अंतिम प्रसंग और स्मृतियाँ
उनके प्रति अपराध अवश्य किया है। हो सकता है. उसी के दण्डस्वरूप मुझे अपराधी मानते हए और उनसे तथा श्रीजीसे क्षमा प्रार्थना करते हुए उनके पास गये। श्रीजीने अपने घरसे निकाल रखा है।' वे मन-ही-मन गिरिजादेवीजीके प्रति अपने को उनसे चलकर ताला खोलनेका प्रयास करनेकी प्रार्थना की। उन्होंने
हँसकर कहा-'जब आप ही लोग कोशिश कर हार गये तो भला मुझसे ताला कैसे खुलेगा ?'
'आप एक बार चेष्टा तो करें।' गोस्वामीजीने आग्रह किया।
वे गयीं और उनके ताली लगाते ही ताला खुल गया। गिरिजाजीको स्वयं इसपर आश्चर्य हुआ। वे समझ गयीं कि यह भी राधारमणजीकी ही एक लीला थी।
कभी-कभी गिरिजादेवीजीको श्रीराधारमणके सान्निध्यका इस प्रकार अनुभव होता कि उसका कोई चिह्न उनके वस्त्रादिपर रह जाता। एक बार उनकी साडीमें ऐसी दिव्य गन्ध समा गयी कि वह बहुत दिनों तक बनी रही। अर्धबाह्य अवस्थामे उसीको पहने वे मन्दिर में दर्शन करने गयीं। उसकी गन्ध पाकर एक गोस्वामीने कहा- 'माताजी, बुढ़ापेमें भी ऐसा बढ़िया इत्र !'
माताजी क्या कहतीं। वे शर्माकर चुप रह गयीं। इस प्रकारकी घटनाओंसे उद्दे लगता कि वे जितना अपने भावको गोपन रखना चाहती है, उतना ही राधारमण उसे प्रकाशित करनेको तुले रहते हैं। वे कर भी क्या सकती थीं ? उनके प्रति प्रणयरोष प्रकटकर रह जाती थीं।
गिरिजादेवीजीकी अवस्था अब ऐसी हो गयी कि उनके नेत्र प्रेमाश्रुओंसे सदा आर्द्र रहते। वे चार व्यक्तियोंके बीच बैठी होतीं तो भी बीच-बीचमें अन्तर्जगतकी किसी अनुभूतिमें ऐसी डूब जातीं कि उनकी आँखें खुली होतीं तो भी वे बाहरको किसी वस्तुको न देख पातीं, कोई कुछ कहता तो उसे सुन भी न पातीं। कोई आवश्यक बात उनसे कहनी होती, तो इतने जोरसे कहनी पड़ती, जैसे वे दूर की जा बैठी हों। वे अपने कमरेमें दरवाजा बन्द करके बैठी होतीं, तो बाहरसे किसीसे बातें करती सुनायी पड़ती। कभी नूपुरकी ध्वनि सुनायी पड़ती, कभी कमरेके भीतरसे दिव्य सुगन्ध फूट पड़ती, जो सारे घरमें व्याप्त हो जाती।
एक बार गिरिजाजी रमणरेतीमें श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराजके दर्शन करने गयीं। भक्तजन उन्हें घेरे बैठे थे। भगवत-चर्चा हो रही थी। वे जब दर्शन करके लौटीं, तो जहाँ वे बैठी थीं. वहाँकी रज बाबाने लेकर अपने माथेसे लगा ली। उन्हें
ऐसा करते देख लोगोंको आश्चर्य हुआ। किसीने पूछ लिया- 'बाबा , आपने ऐसा क्यों किया ?"
की नहीं। वह गोपी थी !' उन्होंने उत्तर दिया- 'मैंने वही किया, जो श्रीउद्धव, ब्रह्मर्षि नारद, परमपिता बह्या आदि करते आये हैं, जो स्वयं श्रीकृष्णने किया है। वह कोई साधारण स्त्री तो
कुछ दिनों बाद श्रीमृत्युञ्जयप्रसाद सिंहका देहावसान हो गया। गिरिजादेवीजीको जमीरा जाना पड़ा। जमींदारीका कार्य देखनेके लिए वहाँ कोई न था, इसलिए उन्हें वहीं रह जाना पड़ा। जमींदारीकी देखभाल तो वे नाम मात्रको करतीं। सारा काम कर्मचारियोंपर छोड रखतीं। स्वयं एक-दो घण्टे छोड़कर हर समय श्रीराधारमणजीकी सेवा-पूजा, नाम जप और
स्मरणादिमें लगी रहतीं। पर वृन्दावन छोडकर सदाके लिए जमीरामें रहना उन्हें भाता कैसे ? वे राधारमणजीसे प्रार्थना करने लगीं कि वे उन्हें अपने नित्यधाम वृन्दावनमें बुला लें, जहाँसे फिर लौटना कभी न हो।
उसी समय जमीरामें एक महात्मा पधारे। उन्होंने एक बड़ा यज्ञ करना चाहा। मरिजादेवीजीने उसका सारा भार अपने ऊपर लेना स्वीकार किया। दो महीने तक एक विराट यज्ञ होता रहा। जमीरामें ऐसा यज्ञ पहले कभी नहीं हुआ था। सारा जमीरा एक अपूर्व आनन्दसे ओत-प्रोत हो गया। यज्ञकी पूर्णाहुतिके दूसरे दिन गिरिजादेवीजी स्वस्थावस्थामें अपना पार्थिव शरीर छोड़कर नित्य-धामको चली गयीं।
गिरिजादेवीजीपर वृन्दावनके एक विशिष्ट महात्माकी विशेष कृपा थी, जिनका संग करनेको वे एक दिव्य सन्देश द्वारा प्रेरित हुई थीं। उनके प्रति उनका गुरुभाव था। पर वे इस असमञ्जसमें रहा करती थीं कि जब वे जमीरामें अपने कुलगुरुसे दीक्षा ले चुकी हैं, तो उन्हें गुरुरूपमें कैसे स्वीकार करें ? एक बार वे उनके और अकी भक्तमण्डलीके साथ मण्डलेश्वर गयीं। मण्डलेश्वरसे कुछ दूर एक गाँवमें अ महात्माका कीर्तन होनेको था। कीर्तनके पूर्व गिरिजादेवीजीके मनमें यह बात आश्रयी कि यदि इनमें और मेरे कुलगुरुमें कोई भेद नहीं है और मुझे इन्हें गुरु मान नेमें कोई हर्ज नहीं है, तो ये आज वही कीर्तन करें, जो जमीरामें मेरे दीक्षा-गुरु किया करते थे। उन्होंने कीर्तन आरम्भ किया-
'भज गाविन्दं, भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढमते'
१. उनकी अनुमति न होने के कारण हम उनके नामका उल्लेख नहीं कर रहे।
सुन रोमाञ्चित हो गयीं। उन्होंने उन्हें गुरुरूपमें स्वीकार कर लिया और वे अपने यही वह कीर्तन था, जो उनके कुलगुरु किया करते थे। गिरिजादेवीजी कीर्तन जन्मोंकी कथा विस्तारसे सुनायी थी। उसके अनुसार यह उनका अन्तिम जन्म था। भजनकी सब बातें उनसे कहने लगीं। एक बार उन्होंने उन्हें अपने पिछले अठारह जन्मोंकी कथा विस्तारसे सुनायी थी। उसके अनुसार यह उनका अन्तिम जन्म था।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीगिरिजादेवी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।