ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 41

श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद

श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद
श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

[ शृङ्गारवट, वृन्दावन ]

आज कार्तिक शुक्लपक्ष पूर्णिमा है और श्रीगौरांग महाप्रभुके वृन्दावन आगमनकी शुभ तिथि। इसके उपलक्ष्यमें पूर्व-पूर्व वर्षोंकी भाँति आज भी कलकत्ता-पाठबाड़ीके सिद्ध श्रीरामदास बाबाजी महाराज और उनके अनेकों भक्त वृन्दावन पधारे हैं। वे गोपीनाथ बाजार स्थित श्रीगौरांग महाप्रभुके मन्दिरं विशाल श्रीविग्रह और गोस्वामीगणके साथ कीर्तन करते हुए वृन्दावन परिक्रमाको निकले हैं। वृन्दावनके असंख्य नर-नारी, जो साल भरसे इस अवसरकी बाट देखते रहे हैं, उनका मधुमय कीर्तन सुननेके लिए उनके साथ हैं। रामदास बाबाजी महाराज अपूर्व नृत्यभंगीमें कृष्णप्रेमोन्मादमें कृष्णको वन-वन ढूँढ़ती विरहिणी राधाके भावमें भावित श्रीमन्नहाप्रभुके आनुगत्यमें खोल-करतालकी ध्वनिके बीच कीर्तन करते जा रहे हैं।

व्रज बने विरहिणी आमादेर प्राण गोरा राय । वियोगिनी, उन्मादिनी, आमोदर प्राण गोरा राय ।। कृष्ण-प्रेम-पागलिनी आमादेर प्राण गोरा राय । आमादेर, प्राण आमादेर गोरा राय ।।

वे जब महाप्रभुकी ओर निहारते, वक्षपर हाथ रख ठुमुक, ठुमुककर नृत्य करते गाने लगते हैं- 'आमादेर* आमादेर, आमादेर प्राण गोरा राय, उनके मुख और वक्ष गर्वसे फूल उठते हैं. नेत्रोंसे आँसुओंकी धार बहने लगती है और शरीर प्रचण्ड वायुके झोंकेसे झकझोरे गये केलेके वृक्षके समान कम्पित होने लगता है। बीच-बीच में वे ऐसी हंकार कर उठते हैं. जिससे दिशाएँ गूँज जाती हैं और भक्तोंक मन-प्राण एक अनिर्वचनीय भाव-समुद्रमें गोते खाने लगते हैं।

बाबाजी महाराज अपने हृदयमें तत्काल स्फूर्त पदोंको गाते जा रहे हैं। भक्तगण उन्हें दोहराते जा रहे हैं। अनेकों दोनों बाहु ऊपर उठाकर नृत्य करते जा रहे हैं। एक अपार जन-समूह मानों भाव-भक्तिकी बाढ़में बहा चला जा रहा है !

बाबाजी महाराजसे कुछ दूर लोग देवकीनन्दन प्रभुपादको मूर्छित अवस्था में कन्धों पर लिए चले आ रहे हैं। मूर्छित होते हुए भी उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बह रहे हैं, मुखसे लार बह रही है और शरीर खोलकी प्रत्येक तालके साथ जैसे उछल-उछलकर नृत्य करता-सा लग रहा है। जो लोग उन्हें अपने कन्धोंपर लिए हैं, उन्हें उनको पकड़े रखना मुश्किल लग रहा है। उन्हें लग रहा है कि जैसे उनके शरीरकी प्रत्येक धमनी 'हरिबोल' की ध्वनिके साथ नृत्य करती चल रही है।

प्रभुपादके लिए यह कोई नयी बात नहीं। उन्हें इस प्रकारकी प्रेम-मूर्छाकी दशामें अनेकों बार पहले भी देखा गया है। श्रृंगारवटके निताईगौरकी शोभायात्रामें भी उनकी अक्सर इस प्रकारकी दशा होती देखी गयी है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

एक बार प्रभुपाद अपने एक सेवकके घर कलकत्ते गये। रात्रिमें कीर्तन हुआ तो आप उठकर उद्दण्ड नृत्य करने लगे। नृत्य करते-करते 'हा निताई!' कह पछाड़ खाकर गिर पड़े। बेसुध अवस्थामें रातभर पड़े रहे। एक युवकको शंका हुई कि उनकी मूर्छा बनावटी है। उसने गुप्त रूपसे शरीरमें कई जगह सुई चुभोकर उनकी परीक्षा की। सुइयोंका कोई असर न होते देख वह लज्जित हो घर चला गया। रात्रिमें उसके माता-पिताको स्वप्न हुआ। नित्यानन्द प्रभुने रोषमें भरकर उनसे कहा- 'तुम्हारे लड़केने मेरी प्रिय सन्तानको सूइयोंसे गोदा है। प्रातः होते ही उस महत् अपराधका प्रायश्चित करो, नहीं तो तुम्हारा सर्वनाश हो जायेगा।'

सबेरा होते ही माता-पिता लड़केको साथ ले प्रभुपादके पास गये। लड़केने उनके चरणोंमें गिरकर रोते-रोते उनसे कहा- 'मैं मूर्ख हूँ। मूर्खतावश मैने आपको बहुत कष्ट दिया है। कृपाकर मुझे क्षमा करें।'

* हमारे।श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद

प्रभुपादने कहा- 'कैसी क्षमा ? तुमने मेरा कौन-सा अनिष्ठ किया है ?'

लडकेको और कुछ कहनेका साहस न हुआ। उसके पिताने जब उनसे सब बात खोलकर कही, तो वे बोले- 'मुझे किसीने सई नहीं चुभोई। तुम्हारे ऊपर निताइचंदने इस छलसे कृपाकी है। तुम धन्य हो ।'

भाव-भक्तिके मूर्त स्वरूप श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपादका जन्म नित्यानन्द प्रभुकी गयारहवीं पीढीमें श्रीयशोदानन्द गोस्वामी प्रभुके पुत्ररूपमें हुआ था। पढ़े-लिखे नाम-जप और ठाकूर-सेवामें उनकी शुरूसे ही विशेष रुचि थी। पुजारीके रहते हुए वे साधारण ही थी. पर ढाई अक्षर प्रेमके जैसे वे जन्मसे ही पढ़कर आये थे। श्री शृङ्गारवटके निताई-गौरकी प्रात:कालीन सेवा-पूजा-श्रृंगार आदि वे स्वयं करते थे। उनका बाकी समय घरके बाहर बैठकखानेमें हरिनाम-जपमें व्यतीत होता था। घरके किसी कामसे जैसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। घरका और जमींदारका काम उनके भाई श्रीरोहिणीनन्दन और श्रीजानकीनन्दन देखा करते थे।

निताइ-गौरकी वे आत्मवत्-सेवा किया करते। गर्मकि दिनोंमें उनके अङ्गमें पसीना देख दुःखी हुआ करते और घण्टों उन्हें पंखा किया करते, जब कि और किसी को उनके अङ्गमें कहीं पसीना न दीखता।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

एक बार जब वे ठाकुर-सेवा कर रहे थे, श्रीरामदास बाबाजी महाराज भक्तों सहित कीर्तन करते हुए मन्दिरके प्रांगणमें पधारे। वे न जाने कौन-सा गीत गा रहे थे। उसे सुनते ही प्रभुपाद मन्दिरके ऊँचे जगमोहनसे प्रांगणमें कूद पड़े और प्रेमावेशमें रामदास बाबाजी महाराजसे जा लिपटे। बहुत देर तक उन्हें अपने बाहुपाशमें जकड़े हुए अश्रु विसर्जन करते रहे। बिचारे रामदास बाबाजी महाराज पुत्तलिकावत् उनके प्रेमापाशमें जकड़े खड़े रहे। दूसरे लोगोंने बहुत चेष्टा की, फिर भी उन्हें छुड़ा न सके। बाबाके इंगितपर जब उन्होंने कोई और कीर्तन प्रारम्भ किया, तब वे उन्हें छोड़ दोनों भुजाएँ उठाकर आनन्दसे नृत्य करने लगे।

एकादशी दिन देवकीनन्दन प्रभु पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराजकी कुटियापर अवश्य जाया करते। दोनोंमें प्रेमालाप और इष्ट-गोष्ठी हुआ करती। एक दिन किसी प्रसंगमें देवकीनन्दन प्रभुने कहा- 'बाबा, जीवन समाप्त होनेको आया, पर अभी तक प्रभुने कृपा नहीं की। न जाने मेरा क्या होगा।'

बाबाने कहा- 'गोसाईंजी, आप ऐसे कहेंगे, तो मेरा क्या होगा ? आपने तो पहले ही प्रभुको अपने प्रेमके वशकर रखा है। वे आपके आगे-पीछे डोला करते

समाधिके पीछे सूखे नालेमें श्यामवर्णका एक सुन्दर गोप-बालक गैया दुह रहा है। उसी दिन जब प्रभुपाद घर लौट रहे थे. उन्होंने देखा कि सनातन गोस्वामीकी गैयाकी पीछेकी टाँगे एक सुन्दर जेवरीसे बँधी है. आगेकी एक टाँगसे उसका चारु-चेष्टामें उसके थनोंपर उँगलियाँ फेर रहा है। बालकमें कुछ ऐसा आकर्षण था नवजात बछड़ा बँधा है। गैया बछडेको चाट रही है और गोपबालक गोदोहनकी कि प्रभुपाद ठिठककर उसे देखने लगे। उन्हें देख बालक बोला- 'गोसाई कहा देख रह्यौ है ? तोये देख कैं गैया लात देगी, दूध पलट जायगो।'

प्रभुपाद आगे बढ़ लिए, पर बालककी मधुर छवि उनके हृदय में बस चुकी थी। दो ही कदम आगे जाकर उन्होंने उसे फिर देखनेके लिए गर्दन मोड़ी, तो वहाँ न कोई बालक था, न गैया !

प्रभुपादके बहुत-से शिष्य हुए। वे अपने शिष्योंसे दो बातें विशेष रूपसे कहा करते। एक तो निरन्तर नाम जप करनेकी और दसरी पं० रामकृष्णदास बाबा और श्रीगौरांगदास बाबाजीका यथासम्भव संग करने की।

किया। सन् १९५४ आषाढ़, कृष्णपक्ष तृतीयाको उन्होंने नित्य-लीलामें प्रवेश किया

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।