ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 32

श्रीदयालदास बाबाजी

श्रीदयालदास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीदयालदास बाबाजी
श्रीदयालदास बाबाजी — ब्रज के भक्त भाग 2

श्रीदयालदास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

श्रीदयालदास बाबा कब कहाँसे आये. किसके शिष्य थे और क्या भजन करते ब्रजमण्डलमें प्रसिद्ध थे, उतना ही गौडमण्डलमें भी। वे अपने पास कथा, करुआ, थे कोई नहीं जानता। पर, वे अपने वैराग्य और भजनावेशके लिए जितना कौपीन और बहिर्वासके सिवा और कुछ न रखते। प्रायः व्रजमें ही जहाँ-तहाँ घूमते रहते। अक्सर कथासे सिर ढंककर एक ही स्थानपर निश्चल भावसे चौबीस-चौबीस घण्टे बैठे रहते। दूरसे लगता जैसे कोई गठरी रखी हो।

वे अधिकतर मौन रहते, पर मधुकरी भिक्षाके समय व्रजवासी गृहस्थके दरवाजेपर उच्च स्वरसे 'हरे कृष्ण' कहते। यदि वह उससे भी ऊँचे स्वरसे 'हरे कृष्ण' कहता, तो भिक्षाके लिए रुक जाते, नहीं तो आगे बढ़ जाते। वे अन्धे थे। फिर भी चुटकी * भिक्षा करते थे और स्वयं पकाकर खाते थे।

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

राजर्षि बनमाली रायसे वे कभी-कभी व्रजवासियोंकी सेवाके लिए कुछ अर्थ माँग लेते थे। पर, अपने व्यवहारमें पैसा-कौड़ी कभी नहीं लाते थे। यदि कोई कुछ दे जाता था, तो उसे राजर्षि बहादुरकी पत्नीके पास रख देते थे। इस प्रकार राजर्षि बहादुरकी पत्नीके पास तीन सौ रुपये हो गये। तब एक दिन उन्होंने सब रुपये माँग लिए और यमुना किनारे बैठकर एक-एककर सब यमुनामें फेंक दिये।

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

उनकी अलौकिक शक्तिका पता चला जब एक दिन उन्होंने राजर्षि बहादुरके बड़े भाई श्रीगिरिधारीदास बाबाजी (पूर्वाश्रमके श्रीअन्नदाबाबू) पर विशेष कृपा की। गिरिधारीदासजी उन दिनों गोवर्धनमें गोविन्दकुण्डपर भजन करते। वे दयालदास बाबाको साथ ले व्रजके कुछ गाँवोंमें प्राचीन लीला स्थलियोंके दर्शन करने गये। उन्हें हार्नियाँ की बीमारी थी और वे ट्रस** पहना करते थे। दूसरे दिन किसी

*

आटा या चावल।

** कमरमें बाँधनेका एक यन्त्र

वैराग्य और विवेक — जीवन-संदेश

वैराग्य का भाव केवल वस्तुओं से दूरी नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य पर स्पष्ट दृष्टि रखना भी है। पाठ में आए प्रसंग पाठक को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर सोचने का अवसर देते हैं।

कथा का सार

श्रीदयालदास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।