ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 40
श्रीअमोलकरामजी शास्त्री
श्रीअमोलकरामजी शास्त्री की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

श्रीअमोलकरामजी शास्त्री का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
बजसे या संस्कृत वाङ्मयसे जिस व्यक्तिका थोडा भी सम्बन्ध है, वह वृन्दावनके धुरन्धर विद्वान, भक्त श्रेष्ठ श्रीअमोलकरामजी शास्त्रीके नामसे अवश्य पुण्डरीक नामक ग्राममें पण्डित शालिगरामजी उपाध्यायके घर उनका जन्म हुआ। परिचित होगा। विक्रम सम्वत् १९२९ फाल्गुन कृष्णपक्ष द्वादशीकी कुरुक्षेत्रके समीप
उनकी कुशाग्र बुद्धि और आध्यात्मिकविषयोंमें असाधारण रुचि देख पिताने उन्हें विद्याध्ययनके लिए काशी भेज दिया। काशीमें वे बड़े मनोयोगके साथ अध्ययन करने ले। परीक्षाओंमें सदा प्रथम श्रेणीमें उत्तीर्ण होकर उन्होंने विशेषरूपसे अध्यापकोंका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।
यहाँ उन्हें सत्संगका भी अच्छा सुयोग मिला। गङ्गापार एक परम तपस्वी महात्मा रहते थे। उनका सत्संग करने वे नित्य जाया करते। उनके सत्संगसे उन्हें संसारसे पूर्ण वैराग्य हो गया। संसार त्यागकर हिमालयकी किसी कन्दरामें तपस्या करनेका उन्होंने निश्चय किया। पर, महात्माने निषेध किया। उन्होंने कहा- 'तुम हिमालय जाकर तपस्या करनेकी मत सोचो। गृहस्थमें रहकर केवल अध्ययन और अध्यापन करो। यह भी एक तपस्या है। मेरा आशीर्वाद है कि इसीके फलस्वरूप तुम्हें भगवान्के दर्शन होंगे।'
महात्माकी आज्ञा शिरोधार्यकर उन्होंने तपस्याका विचार छोड़ दिया। पर, उन्हें प्रेरणा हुई व्रजमें जाकर अध्ययन-अध्यापन और भजन करनेकी वे वृन्दावन चले गये। वहाँ संस्कृत पाठशालामें पढ़ते रहे और स्वामी हरिदासजीकी परम्पराके प्रसिद्ध सन्त श्रीस्वामिनीशरणजीसे दीक्षा लेकर भजन करते रहे।
उन्होंने व्याकरणाचार्य तथा वेदान्ताचार्यकी परीक्षाएँ पास की। उसके पश्चात् न्याय आदि पढ़नेके लिए वे नवद्वीप गये। वहाँ न्याय-रत्न, तर्क-तीर्थ आदि उपाधियाँ ग्रहण कीं। इतनेपर भी उनका अध्ययन और उपाधियाँ प्राप्त करनेका सिलसिला समाप्त न हुआ। 'उभय-वेदान्ताचार्य' 'विद्यावागश', 'द्वैताद्वैत-मार्तण्ड' 'सर्वशास्त्र निष्णात' आदि उपाधियाँ भी एक-एक कर उनके नामके आगे जुडती गयीं।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
अध्ययन समाप्त होनेपर रतलाममें संस्कृत विद्यालयके प्रधान अध्यापकके रूपमें उनकी नियुक्ति हई, पर रतलाममें वे रहते केवल शरीरसे ही। उनका मन पड़ा
रहता बन्दावनमें। मनका तनसे विच्छेद कब तक चल सकता था? वे बराबर सुन ली। वृन्दावनमें श्रीरंग-पाठशालामें उनकी नियुक्ति हो गयी। कुछ दिन वहाँ राधारानीसे प्रार्थना करते रहे, उन्हें वृन्दावन ले चलनेकी आखिर राधारानीने उनकी अध्ययपन करते रहे। फिर श्रीराधावल्लभजीके मन्दिरके निकट एक पाठशालायें प्रधान अध्यापकके पदपर नियुक्त हुए।
अध्यापनके साथ-साथ उनकी एकान्त साधना भी चलती रही। वे कालीदहके निकट एक एकान्त स्थानमें रहने लगे। उनहें यमुनाजीसे बड़ा अनुराग था। वे नित्य यमुना-स्नानको जाते। ११ बजे तक यमुना-तटपर ध्यानमें बैठे रहते। कभी-कभी वहाँ बैठे-बैठे सन्ध्या हो जाती और उन्हें पता भी न चलता।
इस बीच उनके पांडित्यकी ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी। काशी विश्वविद्यालयके संचालक तो ऐसे विद्वानोंकी खोजमें रहते ही थे। उन्होंने अमोलकरामजीसे भी अनुरोध किया विश्वविद्यालयके संस्कृत विभागमें एक विशिष्ट पद सम्हाल लेनेका। उस समय उन्हें वृन्दावनमें केवल ५०) रुपये मासिक वेतन मिलता था। यदि वे काशी विश्वविद्यालयका पद स्वीकार कर लेते. तो उनकी आर्थिक स्थिति तो अच्छी हो ही जाती, उनकी ख्याति भी और अधिक बढ़ जाती। पर वे तो गृहस्थ-जीवन व्यतीत करते हुए भी वृन्दावनेश्वरी और वृन्दावनाधीशके प्रेममें सबकुछ त्याग चुके थे। व्रजधामको छोड़ कहीं अन्यत्र जानेका उनके लिए प्रश्न ही नहीं था। उन्हें न धनका लोभ व्रज छोड़नेको बाध्य कर सकता था, न सम्मान और प्रतिष्ठाका। उन्होंने उस पदको अस्वीकार कर दिया।
गुरु-सान्निध्य और आध्यात्मिक शिक्षा
उन्होंने अपने गुरुदेव श्रीस्वामिनीशरणजीकी बहुत सेवा की। उनकी सेवाके उद्देश्यसे वे बरसाने अकसर जाया करते। एक बार गुरुदेव बहुत अस्वस्थ हो गये। उन्होंने वृन्दावन जाना चाहा। पर, उनकी कुटिया बरसानेकी पहाड़ीपर थी और नीचे उतरनेकी शक्ति उनमें थी नहीं। अमोलकरामजीने उन्हें कन्धेपर बैठाकर नीचे ले चलनेका प्रस्ताव किया। उन्होंने कहा- 'मेरे विशाल शरीरको तू वहन नहीं कर सकेगा।' सभी जानते थे कि अमोलकरामजी जैसे किसी व्यक्तिके लिए यह कार्य कितना दुष्कर था। पर, उन्हें नीचे लाना आवश्यक जान अमोलकरामजीने आवेशमें कहा- 'आपकी कृपासे अवश्य आपको ले जा सकूँगा।' गुरुकृपासे वे उन्हें वहनकर नीचे लानेमें समर्थ हुए। उस समय उन्हें एक विचित्र अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि गुरुदेवका शरीर कितना हलका और गुलाबके फूलकी तरह सुगन्धमय है।
श्रीदेवकीनन्दन गोस्वामी प्रभुपाद
गुरुदेवकी कृपासे उन्हें बरसानेमें श्रीजीऔर उनकी सखियोंका और वृन्दावनमें कुलका साक्षात्कार हुआ।
। वे भी उनसे बहुत स्नेह करते थे। अमोलकरामजीको पण्डित रामकृष्णदास बाबाजी महाराजका संग बहुत प्रिया
सम्वत् २००१ पौष शुक्ला १० को उन्हें निकुञ्ज प्राप्ति हुई। उन्होंने बहुत-ये ग्रन्थोंकी रचना की, जिनकी सूची इस प्रकार है-
(१) परपक्ष गिरि-वज्र (२) वेदान्त-कौस्तुभ प्रभा (३) आत्म-परमात्मतत्वादर्श (४) वेदान्त रत्नमाला (५) वेदान्त तत्त्वबोध (६) आचार्य-स्तवमाला (७) अष्टादश सिद्धान्त पदोंकी टीका (८) छान्दोग्य उपनिषद-भाष्य (९) वेदांत रत्न-मंजूषा (१०) अष्टादश उपनिषद्-भाष्य।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
श्रीअमोलकरामजी शास्त्री की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।