ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 43

पण्डित श्यामसुन्दरजी

पण्डित श्यामसुन्दरजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

पण्डित श्यामसुन्दरजी
पण्डित श्यामसुन्दरजी — ब्रज के भक्त भाग 2

पण्डित श्यामसुन्दरजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ नन्दग्राम ]

नन्दग्रामके श्रीराधारमणजीके पुत्र पण्डित श्यामसुन्दरजीका जन्म सन् १८९५ के लगभग नन्दगग्राममें हुआ। स्वामी अमृतानन्द सरस्वतीजीसे विद्याध्ययन कर वे स्वयं व्रजके पण्डितोंके मुकुटमणि स्वरूप नन्दग्राममें बहुत दिन विराजमान रहे। श्रीमद्भागवतके भी वे बड़े मर्मज्ञ थे। स्वामी करपात्रीजी, श्रीउड़िया बाबा, श्रीहरि बाबा, श्रीकृष्णबोध आश्रमजी और श्रीअच्युतमुनि आदि जैसे विशिष्ट महात्मा भी श्रीमद्भागवत कथा श्रवण करने उनके पास आया करते थे।

वे माध्व-गौड़ीय सम्प्रदायके श्रीश्यामानन्दकी परम्परामें श्रीगोकुलचंद्र गोस्वामीसे दीक्षित थे। इतने बड़े विद्वान होते हुए भी वे बहुत ही सरल और भोले-भाले गरीब व्रजवासी ब्राह्मण थे।

अपने भोलेपनमें ही वे अपने प्रारम्भिक जीवनमें एक संन्यासीके प्रभावमें आये थे। उसकी बतायी उपासनाके द्वारा उन्होंने ऐसी सिद्ध प्राप्त कर ली थी कि वे बिना प्रश्न किये उत्तर दे सकते थे, दूर देशकी और भविष्यकी बातें बता सकते थे।

एक दिन उनके गुरुभाई श्रीहीरानन्दजीने उन्हें सावधान करते हुए कहा- 'यह सिद्धि तुम्हारी उपासनामें बाधक होगी।' उसी समय ललिताकुण्डके एक महात्माने उन्हें श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेकी प्रेरणा दी। उन्होंने सिद्धिको तिलाञ्जलि दे श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेका निश्चय किया। वे नित्य भागवत पाठ करने लगे।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

तब एक दिन स्वप्नमें एक देवीने उनके सम्मुख प्रकट होकर कहा-'मैं कर्णपिशाचिनी हूँ। तुम भागवत छोड़ दो, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूँगी।'

उन्होंने झट उत्तर दिया- 'मैं तुम्हें छोड़ सकता हूँ, पर भागवत नहीं छोड़ सकता।'

उसी दिनसे उन्होंने सिद्धि विसर्जन कर दी। यदि वे ऐसा न करते तो सचमुच मालामाल हो जाते। देश-विदेशमें उनका नाम हो जाता और बड़े-बड़े सेठ साहूकार और राजा-महाराजा उनकी टहल करते। पर, उन्होंने तो श्रीमद्भागवतकी आराधना करनेका निश्चय कर लिया था। शास्त्र कहता है कि जिस क्षण कोई सुकृती पुरुष भागवतका अनुशीलन करनेकी इच्छा भर करता है, उसी क्षण भगवान् उसके हृदयमें आकर बन्दी हो जाते हैं-

श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः ।

सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ।। (भा०१-१-२)

इसलिए उनके हृदयमें भगवान् बन्दी हो चुके थे। जिसके हृदयमें भगवान् विराजते हों, उसके हृदयमें सांसारिक सुख-भाग और मान-सम्मानकी कामनाके लिए स्थान कहाँ ?

उन्होंने प्राप्तकी हुई सिद्धिको तृणवत् त्यागकर सारा जीवन निर्धन और संसारकी आँखोंसे ओझल रहकर नन्दग्रामके नीरव वातावरणमें विर्विघ्न भजनशील जीवन व्यतीत करना ही उपादेय समझा। वे नित्य ब्रह्ममुहूर्तमें उठकर नाम-जप भक्त श्रीज्योतिरामजी

व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ

करते, स्नानादिके पश्चात् आह्निक और श्रीमद्भागवत महापुराणका पाठ करते। मध्याह्नमें भोजनकर बैठकमें चले जाते और नाम जप करते रहते। अपराह्नमें विद्यार्थियोंको भागवत पढाते। रात्रिमें फिर नाम जप करते

-करते सो जाते। उन्होंने सारा जीवन भागवत, भगवान् और भगवान्नामको छोड और किसी अस्तुसे न तो लगाव रखा और न ही उसकी चाहना की।

सन् १९६८ में कार्तिक मासमें वे कुछ अस्वस्थ हुए। दीवालीके दिन ऐसा लगा कि अब उनका शरीर नहीं रहेगा, पर उन्होंने घरवालोंसे कहा- चिन्ता मत करो। मैं आज नहीं जाऊँगा। तुम लोग दीवाली और अन्नकूट यथावत् मनाओ। पंचमीको उन्होंने पूछा- 'गोपाष्टमी कब है ?'

उन्हें बताया गया गोपाष्टमी किस दिन है। तब वे बोले- 'मैं दूसरे दिन खमीको चला जाऊँगा।' जैसे अपने जानेका दिन उन्हें अपनी इच्छानुसार ही स्थिर करना रहा हो। थोडी देर बाद उन्होंने कहा- 'मेरी अस्थि को व्रजके बाहर मत विसर्जन करना।'

अपने निश्चयके अनुसार गोपाष्टमीके अगले दिन नवमीको वे नित्य-धामको बले गये। उनकी अस्थियाँ नन्द-सरोवरमें विसर्जित कर दी गयीं।

वैराग्य और विवेक — जीवन-संदेश

वैराग्य का भाव केवल वस्तुओं से दूरी नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य पर स्पष्ट दृष्टि रखना भी है। पाठ में आए प्रसंग पाठक को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर सोचने का अवसर देते हैं।

कथा का सार

पण्डित श्यामसुन्दरजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।