ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 38

मुखिया श्रीगोकुलदासजी

मुखिया श्रीगोकुलदासजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

मुखिया श्रीगोकुलदासजी
मुखिया श्रीगोकुलदासजी — ब्रज के भक्त भाग 2

मुखिया श्रीगोकुलदासजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ श्रीहर्षप्रियाजी ]

मुखिया श्रीगोकुलदासजीका जन्म संवत् १९३५ में राजस्थानके महुआ ग्रामके एक ब्राह्मण परिवारमें हुआ। रूप, गुण और भक्ति-भावमें वे साधारण बालकोंसे बिलकुल भिन्न थे। १२ वर्षकी अवस्थामें ही वे भरतपुरके लाला महाराजके मन्दिरके श्रीरेवतीशरणदास बाबाने दीक्षा ग्रहणकर उनकी सेवामें रहने लगे।

एक दिन एक रामलीला मण्डलीके स्वामीकी उनपर दृष्टि पड़ी। श्रीरेवतीशरणदास बाबाके पास जाकर वे बोले- 'मेरी आपसे एक विनम्र प्रार्थना है। यदि आज्ञा हो तो कहूँ।'

'अवश्य कहिए' बाबाने उत्तर दिया। स्वामीने कहा- 'आपके इस बालकको देख मुझे प्रेरणा हो रही है कि यदि यह मण्डलीमें रामका स्वरूप बना करे तो अच्छा हो। रूप, गुण, शील और स्वभावमें यह कितना कुछ रामके अनुरूप है। रामके

स्वरूपमें इसे देख लोगोंको लगेगा जैसे साक्षात् श्रीरामका ही लीलामें आविर्भाव हुआ है। मेरी यह प्रार्थना है कि रामलीलाके दर्शक भक्तोंका सुख-विधान करनेके हेतु आप इस बालको कुछ दिनके लिए मुझे दे दें।'

बाबा कुछ असमंजसमें पड़ गये। थोडी देर बाद बोले- 'इस बालकको थोडे दिनके लिए भी आपको देनेमें मुझे जो कष्ट होगा उसकी आप कल्पना नहीं कर सकते। पर यदि इसके द्वारा भक्त-समाजकी कुछ सेवा हो सकती है, तो आप इसे अवश्य ले जायें।'

गोकुलदासजीको गुरुदेवकी आज्ञासे यह सेवा स्वीकार करनी पड़ी। थोड़े ही दिनोंके अभ्यासके पश्चात् वे रामजीका बड़ा सुन्दर अभिनय करने लगे। उनका अभिनय इतना स्वाभाविक और भाव-भक्तिसे भरा होता कि लोग उसे देख हेड-गेहकी सुध भूल जाते। उसके कारण मण्डलीकी ख्याति चारों ओर फैलने लगी। कुछ विद्वेषी लोगोंको यह देख ईर्ष्या हई। वे मण्डली को नीचा दिखानेकी सोचने लगे।

एक दिन भरतपुरमें मण्डलीको धुनष-यज्ञकी लीला करनी थी। उसके लिए धूम-धामसे तैयारियाँ की गयीं। एक धनुष भी बनाया गया, जो आसानीसे टूट सकता था। विद्वेषी लोग भी बाहरसे उत्साह दिखाते हुए तैयारी में जुटे थे। धनुष देखकर उन्होंने कहा- 'यह धनुष ठीक नहीं। इसे भली प्रकार स्वर्णिम गोटेसे सजाकर रखना चाहिये। हमें दीजिए हम इसे सजा लाएँ।'

दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग

स्वामीने कहा- 'अब समय अधिक नहीं है। गोटा आदि लानेमें विलम्ब होगा। इसलिए ऐसे ही रहने दीजिये।'

'आप चिन्ता न करें। हम इसे झट सजाकर लीलाके पूर्व मंचपर रख देंगे' - इतना कह वे लोग धनुष ले गये। उन्होंने पहलेसे ही लोहेका धनुष बनवाकर उसपर गोटा लपेटकर और सुन्दर फूलोंसे उसे सजाकर रख छोड़ा था। उस धनुषको लीलाके समयपर मंचपर ले जाकर रख दिया।

लीला प्रारम्भ हुई। एक-एककर राजा आये और धनुषसे जूझकर परास्त होनेका अभिनय कर चले गये। जनकजी विषादभरी वाणीमें बोल पड़े-

'अब जिन कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी ।।

तजहु आस निज-निज गृह जाहू। लिखा न विधि वैदेहि बिबाहू ।।

- अब कोई वीरताका अभिमानी मेरी बातका बुरा न माने। मैंने जान लिया कि पृथ्वीमें कोई वीर नहीं रहा। सीताके विवाहकी आशासे आये देश-विदेशके

राजाओं, तुम अब उसके विवाहकी आशा छोड अपने-अपने घर जाओ। विधिने सीताके भाग्यमें विवाह नहीं लिखा।'

तब विश्वामित्रने रामचन्द्रजीको आज्ञा दी -

उठहु राम भजह भव चापा। मेटह तात जनक परितापा ।।

- राम ! उठो, अब समय आ गया। शिवजीका धूनष तोडकर जनकका संताप दूर करो।'

गुरुके वचन सुन मञ्जरूपी उदयाचलपर रामरूपी बालसूर्य उदय हुए। उन्हें देख सीताजीका हृदय-कमल खिल गया। वे आकुल-व्याकुल भावसे मन-ही-मन शिव और दुर्गा को मनाने लगीं। फिर गणेशजीसे प्रार्थना कर कहने लगीं-

'गन नायक वर दायक देबा। आजु लगें कीन्हिउँ तुम सेवा।

बार-बार विनती सुन मोरी । करहु चाप गरुता अति थोरी ।।

- हे वर देनेवाले देव श्रीगणेशजी। मैंने आज ही के लिए आपकी सेवा को थी। मैं बार-बार विनती करती हूँ कि धनुषकी गरुता बहुत कम कर दीजिये।'

उसी समय श्रीरामने एक बार सीताजीकी ओर देखा। फिर एक बार धनुषको ऐसे देख जैसे गरुड़ छोटे-से साँपको देखे, उसे फुर्तिसे उठा लिया।

तब विद्वेषी जन यह सोचकर प्रसन्न होने लगे कि अभी तक धनुषके बदले जानेके राजका किसीको पता नहीं चला है और रामकी और रामलीला मण्डलीको किरकिरी अब होने ही वाली है। श्रीराम अपनी सारी ताकत लगाकर हार जायेंगे, फिर भी धनुष नहीं टूटेगा। धनुष यज्ञ असफल हो जायेगा। पर,

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

'लेत चढ़ावत खैचत गाढ़े । काहुँ न लखा देख सब ठाढ़ें ।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।

धनुषको लेते, चढ़ाते और जोरसे खींचते किसीने नहीं देखा, एक भयंकर ध्वनि हुई और रामने बीचसे धनुष तोड़ दिया! दर्शनकोंकी जय-जयकारसे आकाश गूँज गया।'

खिसक गये। विद्वेषी लोग दाँतों तले ऊँगली दबाने लगे और लज्जित हो उसी समय वहाँसे

पीछे टूटे हुए धनुषको देख उनकी कारस्तानीका पता चल गया। सबको आश्चर्य हुआ कि गोकुलदाससे लोहेका धनुष तिनकेकी तरह कैसे टूट गया।

श्रीसाधु माँ

गोकुलदासको स्वयं भी इसका कुछ पता नहीं। उन्होंने तो साधारण बाँसका बना जानकर उसे उठाया था और यही जाकर बिना किसी परिश्रमके तोड़ डाला था। पर टूटे हुए धनुषको देख उन्हें यह समझने में देर न लगी कि धनुष उठाया उन्होंने, तोडा रामजीने !

प्रभुकी अपने ऊपर इतनी कृपा देख उनका मन उनके चरणोंमें रम गया। संसारसे पूर्ण विरक्ति हो गयी। उन्होंने सारा जीवन उन्हींका भजन और चिन्तन करनेका निश्चय किया। इतने कृपालु प्रभुको पाकर फिर संसारका भजन और विन्तन क्या करना। गुरुदेवसे विरक्त वेष लेकर वे वृन्दावन चले गये और यमुना-तटपर श्रीजीके बगीचेमें रहकर गोपाल मन्त्रराजकी साधनामें लग गये।

समाज-गायनमें वे बड़े प्रसिद्ध हुए। उनके श्रीयुगलशतक और श्रीमहावाणीके समाज-गायनसे प्रसन्न हो जगद्गुरु श्रीनिम्बार्काचार्य णद पीठाधीश्वर श्रीबालकृष्णदेवाचार्यजी ने उन्हें बनखण्डी महादेवके पास स्थित छोटीकुञ्जकी सेवा प्रदान की। तबसे वे छोटीकुञ्जमें रहने लगे।

उन्होंने राधा-कृष्णके और हंस भगवान्से लेकर श्रीहरिव्यास देवाचार्य तकके आचार्योंके अनेकों बधाईके पदोंकी रचनाकी है। पदोंमें 'हर्षप्रिया' की छाप दी है।

विक्रम सम्वत् १९७५ श्रावण कृष्णपक्ष सप्तमीको उन्होंने श्यामा-श्यामकी नित्य-लीलामें प्रवेश किया।

वैराग्य और विवेक — जीवन-संदेश

वैराग्य का भाव केवल वस्तुओं से दूरी नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य पर स्पष्ट दृष्टि रखना भी है। पाठ में आए प्रसंग पाठक को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर सोचने का अवसर देते हैं।

कथा का सार

मुखिया श्रीगोकुलदासजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।