ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 49

महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी

महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी
महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी — ब्रज के भक्त भाग 2

महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजीका जन्म सम्वत् १८७० में वृन्दावनमें गोस्वामी चुन्नीलालाजीके घर गीतगोविन्दके रचयिता श्रीजयदेवकी चौबीसवीं पीढ़ीमें और रामराय प्रभुकी ग्यारहवीं पीढीमें हुआ था। बाल्यकालमें वे बड़े खिलाड़ी थे। पढ़ने-लिखनेसे कोई सरोकार नहीं रखते थे। पाठशालाके गुरुजन चुन्नीलालाजीसे कहा करते - महाराज, आप इस बालको घरपर ही पढाएँ तो अच्छा है। पाठशालामें यह न तो अपने पढ़ता है और न ही दूसरोंको पढ़ने देता है।'

पर, वाल्यावस्थासे ही उनमें भक्तिके प्रबल संस्कार थे। उनके चाचा गोस्वामी तुलसीरामजीको शुकदेवजीके स्वप्नादेशसे यमुनामें उनकी श्रीमूर्ति प्राप्ति हुई थी। वे वाल्यावस्थामें ही उनकी बड़े प्रेमसे सेवा करने लगे। शुकदेवजीने उनके बालसुलभ, सहज, स्वाभाविक प्रेमसे प्रसन्न हो उन्हें साक्षात् दर्शन दिये। उनके आशीर्वादसे उन्हें अल्पावस्थामें ही श्रीमद्भागवतका पूर्ण ज्ञान हो गया। उनकी भागवतकी रसमयी कथा सुन बड़े-बड़े पण्डित आश्चर्यचकित रह जाते। एक बार काशीमें उनकी भागवतकी कथा हुई। वहाँके पण्डित उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने भगवत्-अंश जानकर निम्नलिखित श्लोक द्वारा उनकी प्रशंसा की-

'विद्यया वपुषा वाचा वस्त्रेण विभवेन च । वकारैः पंचभिर्ब्रह्मन् ! शोभते भगवान् भवान् ।।

उनके समकालीन श्रीराधाचरण गोस्वामीने अपने 'नवभक्तमाल' ग्रन्थमें उनके सम्बन्धमें लिखा है कि उनके जैसा भागवतका वक्ता न तो कभी हुआ है और न ही होगा-

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

श्रीकलीयदह-निकट व्याससुत दर्शन भाव अर्थ गम्भीर हृदय परिपूरण करि प्रबन्ध कल्पना कथा की प्रथा दीयौ । कीयौ ।। चलाई । वशीकरण सम कियो चित्त भयौ न कोई होयगो वक्ता 'श्रीनन्दकिशोर' पूरण कला-भये श्रोता समुदाई ।। त्रिभुवन रन्ध्रमा । 'भागवत-चंद्रमा' ।।

दतियानरेश श्रीविजयसिंह बहादुरने उनसे 'गोपालचम्पू' की एक मास कथा साज-सामान भेंटकर उनकी बिदा की। उस धनसे उन्होंने वृन्दावनमें श्रीशुकदेवजीके कहलायी और सवालाख रुपये दो हाथी, चार नौकर और बहुत-सा राजसी मन्दिरका निर्माण किया और सुगन्धित पुष्पोंसे उनकी सेवाके हेतु वनविहारके निकट श्रीशुकोद्यान बनवाया।

श्रीशुकदेवजीकी प्रसन्नताके लिए उन्होंने 'श्रीशुकदूत' महाकाव्यकी रचना की। और भी बहुत-से ग्रन्थोंकी रचना की, जिनमें 'श्रीगौर प्रेमोल्लासकाव्य' 'श्रीगोविन्दगुणार्णव-नाटक', 'श्रीराधाविहार चम्पू', 'श्रीमद्भागवतदर्पणकाव्य', 'श्रीरासपञ्चाध्यायी शिखारिणी' और श्रीमद्भागवतकी 'बालबोधिनी' टीका मुख्य हैं।

नन्दकिशोरचन्द्रजीको संसारसे वैराग्य तो तभी हो गया था, जब उन्हें शकदेवजीकी कृपा प्राप्त हई थी। वे संसारमें रहते हुए भी उससे उसी प्रकार अलग थे जिस प्रकार कमल पंकमें रहते हए भी उससे अलग रहता है। इस बातकी पुष्टि एक घटनासे हई, जिसके घटते ही उन्हें संसारको तृणवत् त्यागनेमें पलभरकी देर भी न लगी।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

उनके छोटे पुत्र सोहनलालकी घुड़चढ़ी होनेको थी और वे अपने हाथसे उसके पगड़ी बाँध रहे थे। उसी समय कुछ सन्तोंने आकर उन्हें प्रणाम् किया और कहा- 'हम आपके सेवक हैं।

किया। 'मेरे सेवक ? मैंने तो किसीको विरक्त वेष दिया नहीं' उन्होंने प्रतिवाद

'आपने नहीं, आपकी कथाने हमें विरक्त किया है' सन्तोंने उत्तर दिया।

यह सुन उन्हें लगा जैसे शुकदेवजी संकेत कर रहे हैं कि अब कथावाचकसे भी विरक्त रहकर भजन करनेका समय आ गया है। वे पगड़ी बाँधते-बाँधते संसार त्यागकर चल दिये और रमणरेतीमें रामराय प्रभुकी बैठकपर जाकर रहने लगे। बन्धु-बान्धवोंने बहुत समझाया कि यदि उनका संसार त्यागनेका ही निश्चय है तो विवाह-कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् ऐसा करें। पर, उन्होंने एक न सुनी। उन्होंने कहा-

अब हम लागी हरि सों डोर ।

कच्चो रङ्ग छोड़ि दुनिया कौ रङ्ग रँग्यौ सरबोर ।। रामराय निज पास बुलायो भाखत नन्दकिशोर ।।

रामराय प्रभुकी बैठकपर ही उन्होंने तीन वर्ष लगातार श्रीमदभागवत महापुराणकी कथा कही और कथा समाप्तकर सम्वत् १९१२ में परम-धामधे पधारे। वहीं उनकी समाधि है।

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

महाकवि गोस्वामी श्रीनन्दकिशोरचन्द्रजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।