ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 13
मदनटेरके अन्धेबाबा
मदनटेरके अन्धेबाबा की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

मदनटेरके अन्धेबाबा का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
भक्ति-प्रेम और विरह की अनुभूति
[ वृन्दावन ]
(मदनटेरवाले बाबाका यह सक्षिप्त वृत्तान्त हमें प्राप्त हुआ है भक्तप्रवर श्रीकाशीप्रसाद श्रीवास्तव, भूतपूर्व एस०पी० जयपुरके सौजन्यसे। उन्होंने इसे सुना था अपने गुरुदेव रमणरेतीके सिद्ध श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराजसे, जिन्हें अपनी युवावस्थामें कुछ दिन इन महात्माका संग प्राप्त हुआ था।)
आजसे लगभग ७० वर्ष पूर्व वृन्दावनमें मदनमोहनजीके मन्दिरके निकट किसी कुटियामें एक अन्धे बाबा रहते थे। उनका नाम कोई नहीं जानता। सब लोग उन्हें मदनटेरवाले बाबाके नामसे पुकारते थे, क्योंकि वे मदनटेरपर ही अधिक रहते थे। वे प्रायः उठते ही स्नानादिसे निवृत्त हो जलका करुआ ले मदनटेरके सघन कुञ्जोंमें जा बैठते । दिनभर राधाकृष्णकी लीलाओंका स्मरण करते हुए अश्रुविसर्जन करते। सन्ध्या समय गोविन्दजीके मन्दिर में जाकर रो-रोकर उनसे कुछ निवेदन करते और लौट आते। लौटते हुए दो-चार घरोंसे मधुकरी माँग लाते और खाकर हो जाते। पर आते-जाते, खाते-पीते सब समय उनके आँसू बहते रहते।
अनवरत अश्रुविसर्जन करते रहने के कारण ही वे अपनी दृष्टि खो बैठे थे, पर इस कारण वे तनिक भी क्षुब्ध न थे। क्षुब्ध तो तब होते जब उस जगत्से वे कोई सरोकार रखते होते, जिसका नेत्र दर्शन कराते थे। उनके लिए नेत्रोंकी सार्थकता थी केवल प्रभुके दर्शनमें। जो नेत्र प्रभुका दर्शन नहीं करा सके थे, उनका न रहना ही अच्छा था उनके लिए।
पर, अब दिन-रात रोते-रोते बाबा को ४० वर्ष बीत चुके थे। जीवनकी सच्या आ पहुँची थी। धैर्यका बाँध टूट चुका था। विरह-वेदना असह्य हो चली थी। कभी-कभी उस वेदनाके कारण मूर्छित हो घण्टों मदनटेरके झुरमुटोंके बीच अचेतन पड़े रहते। उनसे सहानुभूति प्रकट करनेवाला वहाँ कोई न था। केवल रहोंकि पक्षी-मोर, पपीहा और कोकिल आदि अपने कलवरसे उनकी चेतना गानेकी व्यर्थ चेष्टा किया करते।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
एक दिन जब वे मदनटेरमें बैठे रो रहे थे, राधाकृष्ण टहलते हुए उधर आ निकले। बाबाको रोते देख राधाजीने श्रीकृष्णसे कहा- 'प्यारे, जा बाबा बड़ो रोय रखो है। जाको हँसाओ न नेंक।'
श्रीकृष्णने बाबाके पास जाकर कहा- 'बाबा, रोबे क्यूँ है ? तोय काउने मारयो है ? काउने तेरो कछु छीन लियो है ?'
'ना बाबा, तू जा हिंयाँसे,' बाबाने झुंझलाकर कहा।
'बाबा तोय छाछ लाय दऊँ, रोटी लाय दऊँ। और कछ कहे सो लाय दॐ। रोबे मत।' श्रीकृष्णने फिर कहा।
'अरे ग्वारिया, तू जा न अपनी गड़याँ चरा जायकें। तोये कहा मतलब मोंसे ?' कहते हुए बाबा मुँह दूसरी ओर मोड़कर बैठ गये।
श्रीकृष्णने राधासे जाकर कहा- 'बाबा तो मानेइ नाँय, रोबेई रोवे।'
राधाने कहा- 'प्यारे, तुम नाँय हँसाय सके। मैं अबई हँसाऊँ।'
राधाने बाबाके पास जाकर कहा- 'बाबा, तू क्यों रोबे ? तेरी बऊ मर गयी है का ?'
बाबा हँस दिये। बोले- 'लाली, मेरे बऊ-अऊ नाँय।'
'अच्छो, तो तू जा मारे रोबे तेरो कोऊ हय नाँय।'
'लाली, जाते नाँय रोऊँ, जाते रोऊँ मेरे जो हैं मोंको भूल गये हैं।'
'बो कौन हैं तेरे, बाबा ?'
'लाली, तू नाँय जानें। बाई व्रजको छलिया, जाको भजन करतो-करतो बुढे हय गयो, एक झलकाऊँ नाँय दिखायी बाने। और लाली, बाकी कहाँ कहूँ, बाले संगसे लाली राधा हू निष्ठुर हय गया -
'मैं-मैं निष्ठुर ?' कह राधा चौंक पड़ी। दूसरे ही क्षण अपनेको छिपाते हुए बोलीं- 'बाबा, मेरो नाम भी राधाई है। तो बता तू कहा चाहे ?'
परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग
'चाहूँ कहा हूँ, मेरे जीवनकी सन्ध्यामें एक झलक दिखाय जाते। और कड़ चाहूँ ?'
'बाबा, तू बड़ो भोरो है। तोये सूझे तो हय ना। देखेगो कैसे ?'
'लाली, भोरी तो तु है। जाने नाँय, जा समय वे अपने कर-कमलन तें स्पर्श करेंगे, आँखनमें ज्योति न आय जायेगी ?'
भोरी लालीसे और न रहा गया। उसने अपने कर-मकलसे बाबाकी एक आँख स्पर्श की। उसी समय लालजीने उनकी दूसरी आँख स्पर्श की। स्पर्श करते काम्बबनके छोटे बाबा
ही बाबाकी आँखोंमें ज्योति आ गयी। सामने खड़े राधा और कृष्णके दर्शन कर वे अतिशय आनन्दके कारण मूर्छित हो गये।
मछित अवस्थामें वे रातभर वहीं पड़े रहे। प्रातःकाल वृन्दावन परिक्रमाको निकले कुछ लोगोंने उन्हें पहचान लिया। वे उन्हें उसी अवस्थामें मदनमोहनके मन्दिरले गये। मन्दिरके गोस्वामीजी समझ गये कि उनके ऊपर मदनमोहनजीकी कोई विशेष कृपा हुई है। उन्होंने उन्हें घेरकर सबके साथ कीर्तन प्रारम्भ किया। कीर्तन-ध्वनिके कानमें पहुँचते ही उन्हें धीरे-धीरे चेतना हो आयी।
तब गोस्वामीजी उन्हें एकान्तमें ले गये। उनकी यथोचित सेवा-सुश्रूषाके पश्चात् जब उन्होंने उनसे मूर्छाका कारण पूछा, तो उन्होंने रो-रोकर उन्हें सारी घटना सुना दी।
बाबाने जिस वस्तुकी कामना की थी, वह उन्हें मिल गयी। फिर भी उनका दोना बन्द न हुआ। रोना तो पहलेसे भी और बढ़ गया। राधाकृष्णके मिलकर बिछुड़ जानेका दुःख उनके न मिलनेके दुःखसे भी अधिक असह्य हो गया। इस दुःखमें रोते-रोते वे कुछ ही दिन बाद जड़-देह त्यागकर अपने सिद्ध देहसे उनसे जा मिले।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
मदनटेरके अन्धेबाबा की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।