ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 21

ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी

ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी
ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी — ब्रज के भक्त भाग 2

ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

जयपुर राज्यके सवाई माधोपुरके निकट लसोड़ा एक ग्राम है। वहाँ महोवतरामजी नामके एक सनाढ्य ब्राह्मण रहते थे। उनके तीन पुत्र थे- नन्दराम, गणेशराम और अमरनाथ। महोवतराम एक व्यापारी थे। सामान इधर-से-उधर लाने-ले-जानेके लिए वे बहुत-से बैल रखते थे। उनके स्वर्गवासी होनेके बाद उनके तीनों पुत्र उनका कारो-बार सम्हालने लगे।

एक दिन गणेशराम बैलोंको जङ्गल चराने ले गये। बैलोंमें एक अग्रणी था, जिसे धौंसाका बैल कहते थे। उसीके पीछे-पीछे दूसरे बैल चला करते थे। दैवयोगसे

दुःख हुआ। उस दिन एक सिंह उसके ऊपर झपट पड़ा और उसे मार डाला। सायंकाल गणेशरामने घर लौटकर धोंसाके बैलके मारे जानेकी बात कही, तो सबको बड़ा

प्रायः जहाँ सिंहोंका प्रकोप होता है. वहाँके निवासी सिंहका मुकाबला कर लिया करते हैं। यहाँ तक कि वहाँकी स्त्रियाँ भी कभी-कभी सिंहको मार लेती हैं। गणेशरामकी भाभी भी बडे वीर स्वभावकी महिला थी। उसने गणेशराम से कहा- 'तुम्हारे रहते सिंह बैलको मार गया! डूब मरनमेकी बात है तुम्हारे लिए।'

गणेशरामको यह बात चुभ गयी। उसने सोचा- भाभी ठीक कहती है। बैल मारा गया मेरी कायरताके कारण ही। मेरे लिए डूब मरना ही अच्छा है।

वह उसी समय गया लसोडासे एक मील दूर, जहाँ पर्वतोंके बीच झोझाकी बोल है और उसमें कूद पड़ा। भगवत्कृपासे वह मरा नहीं। गाँववालोंने उसे निकाल लिया। फिर भी वह घर नहीं गया। दैवयोगसे झीलमें उसे एक शालिग्रामकी मूर्ति प्राप्त हुई। उसे उसने भगवान्‌का दिव्य सन्देश समझा, जिससे उसकी जीवनकी दिशा बदल गयी। वह शालिग्रामको ले वृन्दावन चला गया।

उस समय उसकी आयु लगभग १७-१८ वर्ष की थी। उसका जन्म वि० सं० १८५५ माघ शुक्लपक्ष पञ्चमी को हुआ था। वृन्दावन जाकर उसने वंशीवटके महात्मा श्रीबलदेवदासजीसे दीक्षा ली। उन्होंने नाम रखा श्रीगिरिधारीशरण।

भजन-साधना और नाम-स्मरण के प्रसंग

ब्रह्मचारी गिरिधारीशरणजीने तब गुरुदेवसे पूछा- 'मुझे कहाँ रहकर किस प्रकार भजन करना चाहिए ?'

गुरुदेवने आज्ञाकी- 'तुम्हें जहाँ शालिग्राम मिले थे, वहीं जाकर गोपाल-मन्त्रका जप करो।'

गिरिधारीशरणजी झोझाकी झीलपर जाकर गोपाल-मन्त्रका जप करने लगे। १२ वर्ष तक लगातार निष्ठापूर्वक जप करनेके पश्चात् उन्हें मन्त्र-सिद्धि हुई।

मन्त्र-सिद्धिके फलस्वरूप ब्रह्मचारीजीको वाक्-सिद्धि हो गयी। उन्होंने जिसे जो आशीर्वाद दिया वह फलीभूत हुआ। बहुत-से राजा-महाराजा उनके शिष्य हुए और बहुत-से देवालयोंका उनके द्वारा निर्माण हुआ।

मन्त्र-सिद्धिके पश्चात् ब्रह्मचारीजी वृन्दावन चले गये और वंशीवटपर एकान्त भजन करने लगे। उस समय तक उनकी ख्याति चारों ओर फैल चुकी थी और राजा-महाराजा तथा सेठ-साहकार उनके दर्शन करने आने लगे थे।

एक बार ईशरदा (जयपुर) के राजा रघुवीरसिंहजी उनके दर्शन करने आये। उनके कोई सन्तान न थी। उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी रानी जोधीजीके दो पुत्र हुए सरदारसिंह और कायमसिंह।

कायमसिंह जब १७-१८ वर्षके हुए जोधीरानी उन्हें लेकर वृन्दावन आधी और बह्मचारीजीसे उन्हें वैष्णवी दीक्षा दिलवायी। कायमसिंहजीकी उन दिनों कहा- 'चिन्ता न करो। ईशरदा क्या, इसे जयपुरकी राजगद्दी मिलेगी।' हुआ भी ईशरादसे खट-पट चल रही थी। इसलिए रानी चिन्तित थीं। ब्रह्मचारीजीने यही। वि०सं० १९३७ आश्विन कृष्णपक्ष नवमीको कायमसिंह जयपुरके राजा हो गये। बह्मचारीजीने उनका नाम रखा था माधवसिंह। उसी नामसे वे प्रसिद्ध हुए।

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

संवत् १९१४ गदरमें ग्वालियरके राजा राव जियाजीरावका राज्य उनसे हस्तान्तरित हो गया था। उन्होंने भी ब्रह्मचारीजीकी शरण ली। उनके आशीर्वादसे उन्हें अपना राज्य फिर मिल गया। उन्होंने ब्रह्मचारीजीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करनेके लिए छोटीकुञ्जका निर्माण किया और उसने उनके भजन करनेके लिए एक गुफा बनवायी। उनके भी कोई सन्तान नहीं थी। ब्रह्मचारीजीके आशीर्वादसे राजकुमार माधवरावका जन्म हुआ। तब उन्होंने १२०० रु० वार्षिक आमदनीकी जागीरका पट्टा उनके नाम लिख दिया।

ब्रह्मचारीजी एक बार छटीकराकी ओर जंगलमें जा बैठे। वहाँ भी उनके प्रतापसे गोपालगढ़ नामसे एक सुन्दर मन्दिरका निर्माण हो गया और श्रीगिरिधर गोपालकी सेवा-पूजा होने लगी। उनकी प्रेरणासे माधवसिंहजीने बरसानेमें गिरिशिखरपर और वृन्दावनमें मथुरा रोडपर दो विशाल मन्दिरोंका निर्माण किया। राजपुर में दाऊजीके मन्दिरसहित कई और मन्दिरका निर्माण भी उन्हीं की प्रेरणासे हुआ।

जयपुर और ग्वालियरके अतिरिक्त ओल, कासगंज, कांकेर, हाथरस आदि कई स्थानोंके राजा और नेपालके राणा जंगबहादुर भी उनके शिष्य हुए। पञ्चमजॉर्जके शुभागमनपर दिल्ली दरबार में उन्हें आमन्त्रित किया गया।

ब्रह्मचारीजी पढ़े-लिखे एक अक्षर भी नहीं थे। उन्हें जो सफलता मिली और जो उनकी प्रसिद्धि हुई वह केवल गोपाल-मन्त्रकी सिद्धि प्राप्तकर लेनेके कारण ही।

वे श्रीहरिव्यासदेवाचार्यजीके द्वादश शिष्योंमें अन्यतम श्रीलाफरगोपालदेवाचार्यजीकी परम्परामें उनकी १३वीं पीटिकामें हुए। वि० संम्वत् १९४६ फाल्गुन शुक्लपक्ष १५ को उन्होंने अपनी ऐहिक लीला समाप्त की।

गुरु और साधना — जीवन-संदेश

गुरु के प्रति श्रद्धा और साधना में निरंतरता भक्ति-परंपरा के प्रमुख विषय हैं। इस चरित्र को पढ़ते समय यह देखना उपयोगी है कि सीख और आचरण किस तरह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

कथा का सार

ब्रह्मचारी श्रीगिरिधारीशरण देवजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।