ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 48

भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत

भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत
भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत — ब्रज के भक्त भाग 2

भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

वि० सम्वत् १९७० भाद्रकी अमावस्या। जयपुर राज्यके अन्तर्गत लोरडी ठिकानेके जागीरदास ठा० लक्षमणसिंहके पुत्र कु० सवाईसिंहके घर भक्तराज श्रीमानसिंहजीका जन्म हुआ। माता-पिताके लाड़-प्यार, दास-दासियोंकी सेवा-सुश्रूषा और परिवारके अतुलनीय-वैभवके परिवेशमें उनका लालन-पालन होने लगा। अय:क्रमके साथ उनके रूप और गुणोंका भी विकास होने लगा। लोरडीका वातावरण गूंज उठा वहाँके चरणोंके स्वरसे, जो उनके रूप गुणोंकी प्रशंसा गा-गाकर इस प्रकार करने लगे-

'गौर वर्ण ग्रीवा सुभग, आनन ओज अपार । उन्नत भाल विशाल उर, कोमल गात कुमार ।। सुन्दर सुघड़ सुशील वर, सद्गुण युत साकार । वदन विलोकि विलोकि बहु, मुरझावति नर नार ।। सुखदायक लायक सुभग, मीठो बोलन हार । मति सुशील मन भावनो, सब जीवन हितकार ।। विद्या विनय विवेकता, क्षमता शील सचाय ।

अपनाई आजन्म से, मान कुमार मन भाय ।।'

पर, इन सब गुणोंके होते हुए भी सवाईसिंहजीको चिन्ता रहने लगी, उनमें क्षत्रियताके कुछ संस्कारोंकी कमी देख। उन्हें क्षत्रियोंके प्रिय खाद्य मांस और मदिरासे घृणा थी। वे किसी प्रकारकी हिंसाके कट्टर विरोधी थे। नवरात्रमें उनके घर देवीपूजाके अवसरपर जब पशुबलि होनेको होती तो वे वहाँसे उठकर चले जाते। वे बलिकी बेदीपर एक निर्दोष और असहाय पशुका रक्त बहते न देख सकते।

सवाईसिंहजीने बहुत चेष्टाकी उन्हें बन्दूक चलाना, घोड़ेकी सवारी करना, शिकार खेलना आदि सभी प्रकारकी क्षत्रियोचित शिक्षा देने की। पर उनकी इन सब कार्योंमें रुचि न हुई। उनके जन्मजात संस्कार इसके बिलकुल विपरीत थे। वे धर्म-चरचा, साधु-संग और पूजा-पाठादिमें विशेष रुचि रखते थे। उनकी माँके पास नारायण स्वामी नामके एक सन्त आया करते थे। उनका वे संग करते। धानकिया

ग्रामके दादूपन्थी सन्त श्रीगोपालदासजीके पास भी वे बहुत जाया करते। उनसे गीता पढ़ते।

सवाईसिंहजीने सोचा कि शायद विवाहके पश्चात् लड़केका मन कुछ फिर ठाकुर गिरधारीसिंहजी उदावती सुन्दर और सुयोग्य कन्या मौनकुँवरिजीसे। साल भर जाय। इसलिए उनहोंने १७ वर्षकी अवस्थामें ही उनका विवाह कर दिया बेडके बाद उनके एक पुत्र भी हुआ, पर उनकी मानसिक स्थितिमें कोई परिवर्तन न हुआ। अपितु उनका वैराग्य और भी बढ़ गया।

रख सकती। अल्पावस्थामें ही उन्होंने संसारका सब कुछ देख लिया था। वे अपने अब उनके लिए संसारमें ऐसी कोई वस्तु ही न थी, जो उनहें उससे बाँधकर बीघेकी जमींदारीके टिकाइत (उत्तराधिकारी) थे। सांसारिक सुख-वैभव, मान-दो भाई और तीन बहिनोंमें सबसे बड़े होनेके कारण अपने पिताकी १२००० सम्मान, माता-पिता और भाई-बन्धुओंका प्यार, सुन्दर, साध्वी स्त्री और सन्तान सभी कुछ उन्हें प्राप्त था। संसार इससे अधिक किसीको और दे ही क्या सकता ? फिर भी वह शान्ति, जिसे उनका हृदय चाहता था, उनसे न जाने कितनी दूर थी। संसारसे शान्तिकी आशा करना उन्हें ऐसा लगगता, जैसे उस व्याघ्रसे शान्तिको आशा करना, जो मुँह बाए सामने खड़ा हो, जब चाहे हड़प ले। वे उससे भागकर कहीं अन्यत्र चले जानेको उद्विग्न थे, जहाँ आत्माको वाञ्छित शान्ति मिल सके।

नारायण स्वामी और बाबा गोपालदासजीके संगसे भी उन्हें वह शान्ति न मिली। सचमुच वे स्वयं नहीं जान पा रहे थे कि वे चाहते क्या हैं। पर उन्हें जो अब तक मिला था, उससे उनकी आत्माको तृप्ति नहीं मिली थी। उन्हें एक ऐसे कुशल महापुरुषके परामर्शकी आवश्यकता थी, जो उनकी मानसिक स्थितिको पहचानकर उन्हें उचित परामर्श दे सके।

गीजगढ़के जागीरदार ठाकुर कुशलसिंहजीकी उस समय एक महान साधकके रूपमें राजस्थानमें बड़ी ख्याति थी। मानसिंहजीने भी उनके बारमें सुन रखा था। उन्होंने सोचा कि शायद वे उन्हें उचित मार्ग दिखा सकें। वे घरवालोंसे बिना कहे एक दिन चल पड़े जयपुरकी ओर जहाँ कुशलसिंहजी उन दिनों रहा करते थे। उनसे मिलकर उन्होंने परिचय दिया और अपनी मानसिक स्थितिका वर्णन कर उचित परामर्श देनेकी प्रार्थना की।

उन्होंने कहा- 'तुम्हारी अशान्तिका कारण यह है कि तुमने ज्ञान-मार्गका

भक्ति-मार्गकी ओर है। भक्ति-मार्ग ही सब मार्गोंमें श्रेष्ठ भी है। भक्तिका अवलम्बन सहारा ले रखा है जो तुम्हारे अनुकूल नहीं है। तुम्हारी स्वाभाविक प्रवृति करनेसे तुम्हें शान्ति मिल सकेगी।

'भक्तिका अवलम्बन करनेके लिए क्या करना चाहिए ?' मानसिंहने उत्सुकतासे पूछा।

'भक्तिका केन्द्र वृन्दावन है। तुम्हें वहाँ जाना चाहिए।'

'वहाँ जाकर किसकी शरण लेनी चाहिये ?'

'वहाँ दाऊजीके बगीचेमें पण्डित रामकृष्णदास बाबा रहते हैं। वे ही आजकल उजके भक्तोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। भक्तिका मूर्तिमान स्वरूप ही हैं वे। उनके पास ज्ञानेसे तुम्हें अभीष्ट फलकी प्राप्ति होगी, पर उनकी कृपा प्राप्त करना बहुत कठिन है।'

मार्ग निर्दिष्ट हो जानेपर मानसिंहजीने उसपर चलनेमें एक क्षणका भी विलम्ब न किया। वे उसी क्षण वृन्दावनकी ओर चल पड़े। वहाँ जाकर दाऊजीकी बगीचीके निकट शाहजहाँपुरवाली बगीचीमें किसी साधुके पास ठहर गये। दैन्यवश सीधे पण्डित रामकृष्णदास बाबाके पास जानेका उनका साहस न हुआ।

वे नित्य प्रातः एक स्थानपर जाकर खड़े हो जाते, जहाँसे पण्डित बाबाके शौचको जाते समय दर्शन होते। उनके दर्शन कर वे उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम् कर लेते। तीन माह इस प्रकार बीत गये शाहजहाँपुरवाली बगीचीमें रहते और प्रातः शौचके समय बाबाको प्रमाण करते। वे बाजारसे बेझरका आटा ले आते। कहींसे उठाए टीनके टुकड़ेपर दो टिक्कर सेंक लेते और पानीके साथ उन्हें चबा लेते। दिन भर पण्डित बाबाका ध्यान कर मन-ही-मन उनसे कृपाकी प्रार्थना किया करते।

बाबा नीचा सिर किये नित्य शौचको जाया करते। इनके प्रणाम् करनेपर सिर हिला देते। कभी इनकी ओर ध्यानसे देखनेकी चेष्टा न करते। रोज-रोज उसी स्थानपर खड़े होकर प्रणाम् करते देख एक दिन कौतुहलवश उन्होंने सिर उठाकर इनकी ओर देखा। उन्होंने चेहरेसे जान लिया कि ये किसी साधारण घरके बालक नहीं हैं। पूछा- 'तुम कहाँके हो ?'

मानसिंहजीने अपना परिचय दिया। बाबाने फिर पूछा- 'यहाँ क्यों खड़े रहते हो ? किसकाए

'आपके दर्शन करने।'

बाबा चले गये बिना और कुछ कहे।

एक महीना और इसी प्रकार बीत गया। तब एक दिन बाबाने पूछा- 'कहाँ रहते हो ?'

'शाहजहाँपुरकी बगीचीमें' मानसिंहजीने हाथ जोड़ते हुए धीरेसे उत्तर दिया।

बाबाने कहा- 'चार बजे हमारे यहाँ कथा होती है। आ जाया करो।'

वे कथामें जाने लगे। बाबाकी दृष्टि उनपर नित्य पडती रही। उनका उत्साह और अनुराग देख एक दिन वे बोले- 'तुम यही आ जाओ। किसी लताके नीचे पड़े रहा करो।'

परीक्षा, धैर्य और वैराग्य का प्रसंग

मानसिंहके विषादपूर्ण हृदयाकाशमें जैसे आशाकी एक किरण फूट पड़ी। बाबाकी अपने ऊपर इतनी कृपा देख वे आनन्दसे फूले न समाये। उसी दिनसे दाऊजीकी बगीचीमें जाकर एक लताके नीचे रहने लगे।

दाऊजीकी बगीचीमें बन्दरोंका उत्पात था। मानसिंह जब लताके नीचे रोटी बनाते तो बन्दर ताकमें रहते। कभी-कभी पण्डित बाबा स्वयं डण्डा लेकर खड़े हो जाते और उनसे कहते- 'मैं डण्डा लेकर खड़ा हूँ। तू रोटी बना ले।'

मानसिंहजीको अकस्मात् अलोप हुआ देख घरके लोग चिन्तित हुए। वे उन्हें ढूँढ़ने लगे। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कुशलसिंहजीके पास पहुँचे। उनसे उनके वृन्दावन जानेका समाचार प्राप्तकर वृन्दावन जाकर उनसे मिले। उन्हें बहुत कुछ समझा-बुझाकर अपने साथ घर ले चलनेकी चेष्टा की। पर, उन्हें समझाना बुझाना दीवारसे सिर मारना था। उन्होंने उनकी एक न सुनी। हताश हो वे घर लौट गये। खर्चके लिए कुछ दे गये, जो उनकी सन्तुष्टिके लिए उन्होंने स्वीकार कर लिया।

अब उन्हें दाऊजीकी बगीचीमें पण्डित बाबाके पास रहते ८ महीने हो गये। एक दिन उन्होंने उनसे दीक्षा देनेकी प्रार्थना की। पण्डित बाबातो किसीको दीक्षा देते नहीं थे। उन्होंने पूँछरीके माधवदास बाबासे दीक्षा लेनेकी आज्ञा की। माधवदास बाबासे उन्होंने दीक्षा ले ली, पर वे अन्त तक तन-मनसे पण्डित बाबाको ही अपना वास्तविक गुरु मानते रहे और उन्हींके आनुगत्यमें भजन करते रहे। पण्डित बाबा भी बराबर अपने प्रिय शिष्यकी तरह ही उनके प्रति व्यवहार करते रहे। वे उनसे कितना अधिक स्नेह करते यह इस बातसे स्पष्ट है कि वे किसीको अपने चरण न छूने देते, पर उनसे चरण दबवाया करते। उन्होंने अपनी इस प्रकारकी सेवा करनेका अधिकार और किसीको नहीं दिया।

दीक्षाके पश्चात् वेश भी मानसिंहजीने सम्भवतः माधवदास बाबासे ही ले लिया। पर इसकी निश्चित जानकारी किसीको नहीं है कि उन्होंने वेश किससे लिया। न ही कोई यह जानता है कि उनका वेशका नाम क्या था। लोग उन्हें 'भगतजी' कहकर पुकारा करते। वे वेशधारी बाबाजीकी ही तरह रहते। फटे-पुराने चीथडे जो दूसरे लोग फेंक देते, उन्हींको गूँथकर धारण करते और मधुकरी द्वारा उदरपूर्ति करते। पानी पीनेके लिए एक टीनका पुराना डिब्बा अपने साथ रखते। वजके साधु प्राय: व्रज-रजका करुआ रखते हैं। पर, उन्हें उसके साथ भी परमुखापेक्षिता जुड़ी दीखती, क्योंकि उसके बार-बार टूटने और बार-बार संग्रह करनेका भय रहता।

पण्डित बाबा स्वयं किसीको वेश भी न देते। वेश देना तो दूर वेशके लिए अनुमति भी वे आसानीसे किसीको प्रदान न करते। वे कहा करते - 'हमारा वेश तो जैसे-तैसे निभ गया, पर अब समय ऐसा आ गया है कि वेशकी मर्यादा रखना दुष्कर हो गया है।' कुशलसिंहजीने उनसे वेशके लिए अनुमति माँगी थी, तो उन्होंने मना कर दिया था। इसलिए उन्होंने अन्त तक गृहस्थमें रहकर ही भजन किया था। पर मानसिंहजीने जब उनसे वेशके लिए अनुमति माँगी, तो उन्होंने सहर्ष प्रदान कर दी। वे जान गये थे कि मानसिंहजी पूर्वजन्मके एक योगभ्रष्ट महापुरुष हैं, जो कुछ ही दिनोंमें अपना भजन पूराकर चले जायेंगे।

उनके माता-पिता, भाई-बन्धु, नौकर-चाकर और लोरड़ीके अन्य लोग उन्हें देखने जब तब आते रहते। संन्यासके पश्चात् जब वे आये तो उनकी वेश-भूषा और रहन-सहन उनके त्यागकी प्रशंसामें दुःखभरी तान भरी-

कोमल गात सदा सुखी रयो मान कुमार,

ज्यों धूप बरसात सरदी सहली सारी हूँ ।

बिन सवारी कभी पाँवड़े न हल्यो पैदल, फिरयौ जंगल झाड़े पहाड़िन मंझारी हूँ ।।

कर्ण कहे देख्यो न तो सम त्यागी बड़भागी, माया फंद तोड़ि प्रेमा-भक्ति उर भारी हूँ ।

जवानी ओ अमीरी पै दीनों नहिं नेक ध्यान,

लेकर संन्यास लात वैभव पै मारी हूँ ।।

- कु० कर्णसिंह पिपलाज

मानसिंहजीका त्यागके पूर्वका राजसी वेशमें एक आकर्षक चित्र भागवत-निवासमें, जहाँ पण्डित रामकृष्णदास बाबाकी समाधि है कृपासिंधुदास बाबाने टाँग रखा था। वह चित्र आज भी वहाँ विद्यमान है। किसीने कृपासिन्धुदास बाबासे पूछा-

'आपने मानसिंहजीका राजसी वेशमें यह चित्र आश्रममें क्यों लगा रखा है ? यहाँ तो उनके त्यागमय बाबाजी स्वरूपका चित्र होना चाहिए था।'

बाबाने उत्तर दिया- 'इस चित्रसे उनके त्यागका जैसा परिचय मिलता है, वैसा बाबाजी स्वरूपमें उनके चित्रसे न मिलता। बाबाजी तो बहुत होते हैं। संसारका त्याग वे सभी करते हैं। पर त्याग उन्हींका सार्थक है, जो सर्वसम्पन्न और सब प्रकारसे सुखी होते हुए संसारका त्याग करते हैं। इस चित्रसे पता चलता है कि मानसिंहका त्याग कैसा था। उन्होंने किसी सांसारिक अभाव या दुःखके कारण संसारका त्याग नहीं किया। विपुल धन-सम्पत्ति, सुत और नारी सब कुछ रहते हुए सबका तृणवत् त्याग किया।'

सुत नारी जग विपुल सुख, तृणवत् त्याग। वस्यो विपिन दृढ़ मानसिंह, उत्कट धर वैराग्य ।।

- श्रीजगदीशदास राठौर

वेष लेनेके पश्चात् उन्होंने बाबाकी आज्ञासे संस्कृत और बँगला भाषाओंका अभ्यास किया। गौड़ीय ग्रन्थों और व्रज भाषाके रसिक कवियोंकी वाणियोंका अध्ययन किया और श्रीगौरांगदास बाबाजी महाराज तथा श्रीप्रियाशरण बाबाजी महाराज जैसे रसिक सन्तोंका संग करते हुए लग पड़े मञ्जरी-भावसे व्रजकी रसोपासनामें। उनके मञ्जरी-स्वरूपका नाम गुरुदेवने रखा था 'मदन मञ्जरी'।

घरवालोंसे अब उनका सम्बन्ध कुछ न रहा। पर अपनी मातृ-भक्तिके कारण वे माँसे अपना सम्बन्ध कुछ दिन तक और विच्छेद न कर सके। माँ तो उन्हें देखने बीच-बीचमें वृन्दावन आया ही करतीं। उन्हें वेष लेनेके पश्चात् भी माँके आग्रहपर दो-एक बार लोरड़ी जाना पड़ा। पर जब वे लोरड़ी जाते तो अपने घर न जाकर वहाँसे दूर एक बगीचीमें ठहरते। केवल भिक्षाके लिए माँके पास चले जाते। सन्ध्या समय घरके सामने मन्दिरमें कुछ समय के लिए सत्संग और कीर्तन करते। उनके संगसे घरके लोगोंमें भी भक्तिका उन्मेष हुआ। उन्होंने मांस-मदिराका परित्याग कर दिया। मानसिंहजीने अपने भाई मदनसिंह और नारायणसिंहको गौड़ीय सम्प्रदायमें

श्रीकृपासिन्धुदास बाबासे और बहिनोंको राधावल्लभ-सम्प्रदायमें श्रीरूपलाल गोस्वामीसे दीक्षित करवा दिया।

कुछ दिन बाद पण्डित बाबा धाम पधार गये। उनका विरह मानसिंह सहन न अवस्थामें इधर-उधर भटकते रहते। घरवाले समझे वे पागल हो गये। इलाजके कर सके। 'हा बाबा! हा राधे!' कह वे दिन-रात रोते रहते और उन्मादकी-सी लिए उन्हें जबरदस्ती लोरडी ले गये। उन्होंने इसका प्रतिवाद किया। खाना-पीना सब छोड दिया। इसे भी उनके पिताने पागलपनका ही परिणाम समझा। उन्होंने उनके कमरेमें तरह-तरहके फल, मेवा. मिठाई और अन्य प्रकारके स्वादिष्ट खाद्य सजाकर रखे, जिन्हें देखकर उनकी खानेमें रुचि हो। पर १८ दिन तक उन्होंने कुछ नहीं खाया। पिताजीसे उन्होंने कहा- 'मैं पागल नहीं है। जब तक मुझे वृन्दावन नहीं भेजोगे, मैं कुछ नहीं खाऊँगा।'

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

अन्तमें पिताजीने उन्हें वृन्दावन ले जाकर धीरजलालके बगीचेमें उनके रहनेकी व्यवस्था कर दी। दो नौकर और गाय उनकी सेवाके लिए रख दिये। वे कभी दूध ले लेते, कभी न लेते। पर उन्हें घरवालोंकी यह व्यवस्था अच्छी न लगी। धीरजलालके बगीचेमें और भी साधु रहते थे। इसलिए भी उन्हें वहाँ अनुकूलता न हुई। उन्हें एकान्त प्रिय था। वे हरगुलालके बगीचेमें जाकर रहने लगे। पर, गाय और नौकरोंने वहाँ भी उनका पीछा किया। उन्होंने गायका दूध लेना बन्द कर दिया। वे क्षेत्रसे दो रोटियाँ माँग लाते और उन्हें खाकर रह जाते।

घरवालोंसे पूरी तरह छुटकारा पानेके लिए वे उस उन्मादकी अवस्था में ६ महीनेको न जाने कहाँ चले गये। उन्होंने उनकी बहुत खोजकी। पर कहीं पता न चला। नौकरोंको हटाना पड़ा। गाय भी वहाँसे हटा ली गयी।

६ महीने बाद वे फिर बिहारीजीके बगीचे लौट आये। गोस्वामी रूपलालजीने उनके घरवालोंोंके तारसे सूचना भेज दी। वे फिर आ गये। उन्होंने उनसे कहा- 'मेरे पास मत आया करो। मेरा तुमसे अब कोई सम्बन्ध नहीं। मैं तुम्हारी कोई सेवा नहीं ले सकता। तुम्हारे मेरे पास आनेसे मेरे भजनमें विक्षेप होता है और मुझे कष्ट होता है।'

एक महीनेके पश्चात् घरके लोग घर चले गये। पर एक नौकर छोड़ गये, जो दूरसे उनकी खैर-खबर लेता रहता।

माघ महीनेमें घरके लोग फिर आये। मानसिंहजीने अपने भाई मदनसिंहसे पूछा- 'तुम मथुरा जा सकोंगे ?'

'क्यों नहीं ?' उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया।

'तो मथुरासे मेरे लिए एक बहिर्वास, एक चादर और एक चटाई ला दो। माँ बाबा (पण्डित रामकृष्ण बाबा) के पास जाना चाहता हूँ, पर मैं जहाँ-तहाँक कपडे पहनता रहा है। जहाँ-तहाँका खाता रहा है। इस अवस्थामें उनके निकट जाना ठीक नहीं। शुद्ध होकर नये कपड़ोंमें जाना ठीक होगा। और देखो, फागुनका महीना निकट आ रहा है। श्रीजीके लिए इत्र और गुलाल चाहिए। वह भी लेते आना।'

घरके लोगोंको उनकी इस चायनासे आश्चर्य तो हुआ ही, प्रसन्नता भी बहुत हुई। वे समझे कि उनका उन्माद जाता रहा है। वे जबसे अज्ञातवाससे लौटकर आये हैं एक बार भी पण्डित बाबाकी समाधिपर दर्शन करने नहीं गये हैं। शुद्ध होकर उनकी समाधिपर जानेकी इच्छा करना और उनसे वस्त्रादि ला देनेको कहना उनकी मानसिक स्वस्थताका चिह्न है। उन्हें आशा बँधी कि शायद वे धीरे-धीरे उनकी और भी सेवा स्वीकार करने लगेंगे।

मदनसिंह सब सामग्री ले आये। मानसिंहजीने उनसे वस्त्रादि धोकर अन्य सामग्रीके साथ कुटियामें एक आलेमें रख देनेको कहा। उन्होंने वैसा ही किया।

उसके पश्चात् उन्होंने घरवालोंसे घर लौट जानेका बार-बार आग्रह किया। मदनसिंहको छोड़ बाकी सबने घर चले जानेका निश्चय किया। मानसिंहजीने मदनसिंहसे कहा- 'माँ और बहिनोंका अकेले घर जाना ठीक नहीं। तुम्हें भी उनके साथ जाना चाहिए।' विवश हो मदनसिंहको भी उनके साथ जाना पड़ा, पर वे अपने दासीपुत्र रँगीलेको दूरसे उनकी देख-रेख करनेके लिए छोड़ गये।

उनके जानेके दो दिन बाद, वि० सम्वत् २००२, माघ कृष्णा द्वितीयाको मानसिंहजीने प्रातः श्रीराधावल्लभजीके दर्शन किये। किसीसे एक कुल्हड़ दही लिया। उड़िया बाबाके आश्रममें रासलीला देखी। दावानलकुण्डमें स्नानकर दही पिया और बिहारीजीके बगीचे लौट आये।

उसी समय रँगीला किसी बहाने वहाँ आया। उससे उन्होंने पूछा- 'तू भागवत निवास जानता है ?'

'जानता तो नहीं। पूछता हुआ चला जा सकता हूँ' उसने उत्तर दिया।

'तो वहाँ चला जा। कृपासिन्धुदास बाबाजीसे कहना- 'भगतजी बाबा (पण्डित बाबाकी समाधि) के दर्शन करेंगे। वे उनका प्रसाद ग्रहणकर और उनकी प्रसादी कण्ठी पहनकर आना चाहते हैं। दोनों वस्तुएँ देनेकी कृपा करें।'

रंगीला जानेको प्रस्तुत हुआ। उसी समय मानसिंहजीके जन्म स्थानके श्रीरघुनाथदास बाबा नामके एक साधु, जो कभी-कभी उनके पास आया करते थे, कार्य आ पहुँचे। उनसे उन्होंने कहा- 'बाबा, आप भी रँगीलेके साथ चले जायें तो अच्छा है। वह भागवत-निवास नहीं जानता।' वे नहीं चाहते थे कि उस समय कोई श्री व्यक्ति उनके पास रहे।

रंगीला रघुनाथदास बाबाके साथ भागवत-निवास चला गया। तब मानसिंहजीने स्या बहिर्वास पहना और चादर ओढकर सीधे चटाईपर लेट गये।

रंगीला वापस आया। वह उन्हें इस तरह लेटा देख अवाक् रह गया। उनके से ऊपरकी दिशामें एक ओर स्थिर भावसे टिके हुए थे, जैसे वे किसीकी प्रतीक्षामें हैं। उनसे अनवरत अश्रू प्रवाहित हो रहे थे. जैसे वे अपने किसी परम प्रिय जनके आगमनमें विलम्ब सह न सक रहे हों ! उनके बगलमें इत्रकी शीशी और गुलाल (खा था, जैसे उन्होंने उनके स्वागतकी पूरी तैयारी कर ली हो !

'राधे, राधे। प्रसाद ले आया,' रँगीलेने जैसे ही कहा, उन्होंने निर्निमेष नेत्रोंसे देसे ही ऊपरकी ओर देखते हुए हाथ बढ़ा दिया। रँगीलेने प्रसाद और कण्ठी दे दी। उन्होंने प्रसादका किनका मुँहमें लिया और कण्ठी गलेपर रखी। ऐसा करते हुए भी उनके नेत्र ऊपर ही टिके रहे।

रंगीला भागा गया लाला हरगुलालके मुनीम छाजूरामजीके पास, जो बगीचेमें रहते थे। उनसे कहा- 'चलकर देखिए, भगतजीको क्या हो रहा है। उचित समझें तो झट डॉक्टरको बुला लीजिए।'

छाजूरामजी भागकर आये। उस अवस्थामें उन्हें देखकर उन्हें ऐसा नहीं लगा कि उन्हें कोई शारीरिक कष्ट हो। रँगीलेको कुछ दूर बाहर ले जाकर उससे कहा- 'लगता है वे ध्यानमग्न हैं। तुम उनके ध्यानमें विघ्न न डालना। पीछे बैठे देखते रहना। आवश्यकता हो तो मुझे बुला लेना।'

इतना कह वे अपने कमरेमें चले गये। रँगीला कुटियाकी तरफ लौटा।

लौटते-लौटते उसने सुना मानसिंहजीको धीमे स्वरमें कहते- 'जय हो!', जैसे वे किसीका अभिवादन कर रहे हों! कुटिया तक पहुँचा ही था कि देखा उनका केवल पार्थिव शरीर वहाँ पड़ा है। वे अपने सिद्ध सहबरी देहसे पण्डित बाबाके पास जा पहुँचे, उनके मञ्जरी स्वरूपके आनुगत्यमें निकुञ्जकी रंगीली होलीके अवसर पर जुगलकी इत्र और गुलालसे सेवा करने!

वैराग्य और विवेक — जीवन-संदेश

वैराग्य का भाव केवल वस्तुओं से दूरी नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य पर स्पष्ट दृष्टि रखना भी है। पाठ में आए प्रसंग पाठक को अपने व्यवहार और प्राथमिकताओं पर सोचने का अवसर देते हैं।

कथा का सार

भक्तराज श्रीमानसिंह राजावत की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।