ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 42
भक्तिमती श्रीललिताबाईजी
भक्तिमती श्रीललिताबाईजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तिमती श्रीललिताबाईजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
[ वृन्दावन ]
भक्तिमती ललिताबाईका जन्म सन् १८७४ के लगभग क्षत्रिय जातिके एक भक्त परिवारमें हुआ था। १० वर्षकी अवस्थामें उनका विवाह कर दिया गया। १२ वर्षकी अवस्थामें वे विधवा हो गयीं। भरतपुरके महात्मा चतुर्भुजदासजी, जो सीतारामके उपासक थे, उनके घर आया करते। उनसे उन्होंने दीक्षा देने को कहा। पर, उन्होंने उनमें राधाककृष्णकी भक्तिके संस्कार देख जयपुरके शुक सम्प्रदायके श्रीस्वामी सरसमाधुरी शरणजीसे उन्हें दीक्षित करवा दिया। मनुष्
भक्तिके संस्कार तो उनमें पहलेसे थे ही, वैधव्यके पश्चात् उनका मन संसारसे एकदम हटकर प्रभुके भवतापहारी, अनन्तकोटि चन्द्रमाओंके समान सुशीतल चरणारविन्दसे जा लगा, वे हर समय एकान्तमें उन्हींका चिन्तन करतीं भक्तिगती श्रीललिताबार्तजी ७
प्रेमाश्रुओंसे प्रच्छालन करतीं और उन्हींका भाव-पुष्पोंसे पूजन करतीं। घरके कासंग भी उतना ही करतीं, जितना नितान्त आवश्यक होता।
माता-पिताको लगा कि उनकी लाडली वैधव्यके दु:खके कारण ऐसी हो गयी ।। उन्होंने उसे उसकी बुआके पास वृन्दावन ले जानेका विचार किया, जिससे उसका मन कुछ बदल जाय। बुआजी बहुत दिनोंसे वृन्दावन-वास कर रही थीं और
सिजीके मन्दिरके पीछे अपने गुरु-स्थान हरदेवजीके मन्दिर में रह रही थीं। ललिताबाईसे उसकी माँने कहा- 'तुझे तीजपर बरसाने ले चलें। वहाँ जीके झूलेका दर्शन करेंगे। फिर कुछ दिन बुआजीके पास वृन्दावनमें रहेंगे।'
ललिता यह सुनकर बहुत प्रसन्न हई, पर तीजको अभी पूरा महीना बाकी था। वह एक-एक दिन गिनने लगी। ज्यों-ज्यों दिन बीतते गये उसकी श्रीजीके झूलेके दर्शनकी लालसा बढ़ती गयी। दुर्भाग्यसे तीजके कुछ ही दिन पूर्व उसके छोटे बार्डको म्यादी बुखार हो गया। उसकी हालत तेजीसे बिगडने लगी। माता-पिताको सासानेकी यात्राका विचार छोड देना पड़ा।
तीजका दिन आ गया। उस दिन भाईकी अवस्था बहुत चिन्ताजनक थी। घरके जोग भाग-दौड़में लगे थे। डॉक्टर और वैद्य बार-बार आ-जा रहे थे। ललिता ऊपर एक कमरेमें अकेली पड़ी रो रही थी। श्रीजीके दर्शनका उसका स्वप्न बिखर जानेके कारण उसका दुःख असह्य हो रहा था। वह मना रही थी कि झूलनके समयके पूर्व है शरीरके पिंजड़ेमें आबद्ध उसके प्राण-पखेरू उड़कर किसी प्रकार बरसाने पहुँच जायें।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
धीरे-धीरे सन्ध्या आ गयी। बरसानेमें श्रीजीके झूलेपर विराजनेकी घड़ी भी आ गयी। ललिताके प्राण-पखेरू पिंजड़ेसे निकल भागनेको बुरी तरह छटपटाने लगे। छटपटाते-छटपटाते बेसुध हो गये। उसी समय उसके विषादकी कालिमाको चीरता हुआ उसके सामने कौंध गया बिजलीका-सा एक दिव्य प्रकाश। उसने देखा अपने आपको बरसानेमें श्रीजीके झूलनके दर्शन करते हुए। श्रीजीने अपनी मधुर मुस्कानसे उसके हृदयमें एक अपूर्व आलोड़न उत्पन्न करते हुए उसे निकट आनेका संकेत किया। फिर हस्तकमल मस्तकपर रख कहा- 'कर लिये झूलेके दर्शन ? साथ ही अगल-बगल झूलेकी रस्सी पकड़े खड़ी दोनों सखियोंने प्रेमार्द्र नेत्रोंसे उसकी ओर देखा। बस इतनेमें उसकी बाह्य चेतना जाग गयी और सब कुछ अदृश्य हो गया।
गया।
नीचे भाईकी दशामें भी आशातीत परिवर्तन हुआ। धीरे-धीरे वह पूर्ण स्वस्थ हो गया
तीव्र हो गयी। वह बरसाने जाकर श्रीजीकी सेवामें रहनेका आग्रह करने लगी, पर श्रीजीके दर्शन देकर अदृश्य हो जानेके पश्चात् ललिताकी विरह-वेदना और इतनी छोटी अवस्थामें माता-पिता उसके आग्रहको कैसे स्वीकार कर लेते ? उन्होंने किसी प्रकार उसे बुआजीके पास वृन्दावनमें रहकर भजन करनेको राजी कर लिया।
ललिताबाई १२ वर्षकी अवस्थामें वृन्दावन चली गयीं और बुआजीके संरक्षणमें रहकर भजन करने लगीं। बुआजीके धाम पधारनेके पश्चात् प्रौढ़ावस्थामें वे बरसाने गयीं। ११ वर्ष तक वहाँ अखण्ड वासकर श्रीजीको फूल-शृङ्गार-सेवा करती रहीं। वे दूर-दूर जाकर जहाँ-तहाँसे फूल चुनकर लातीं और श्रीजीके लिए फूलोंके आभूषण तैयार करतीं। एक बार फूल चुननेमें देर हो गयी। आभूषण समयसे तैयार न हो सके। वे मन्दिरके बाहर बैठी शृङ्गार बना रही थीं, उसी समय एक सखी उनके निकट आकर बोली- 'बहुत देर हो रही है। अभी तक लाड़िलीका शृङ्गार नहीं बना और जो शृङ्गार बन पाया था उसकी डलिया उठाकर ले गयी। ललिताबाई भौंचक्की-सी उसकी रूप-माधुरी और दिव्य वेश-भूषा देखती रह गयीं। वह दो-चार कदम आगे जाकर अदृश्य हो गयी।
ललिताजी भरतपुरके महात्मा चतुर्भुजदासजीसे बहुत प्रभावित थीं। वे उनके प्रति गुरुभाव रखतीं पर सरसमाधुरीजी द्वारा बतायी रीतिके अनुसार ही सखी-भावसे चिन्तन करतीं। जयपुरमें उनके द्वारा आयोजित श्रीशुकदेवजी महाराज और शुक सम्प्रदायके आचार्य श्रीचरणदासजी महाराज आदिके उत्सवोंमें सम्मिलित हुआ करतीं।
भक्तों के साथ मिलन और सत्संग
ललितामाधुरीके नामसे वे पद-रचना भी करती। उनका एक बधाई का पद, जो उन्होंने श्रीसरसमाधुरीजीके जन्म-दिवसपर लिखा था, इस प्रकार है-
आज बधाईको दिन नीको।
प्रगटी सरस माधुरी सुख-निधि सब रसिकनको टीको ।
स्वयं स्वरूप श्याम श्यामाको लीनो जन्म अलीको ।
मङ्गल साज सजे सब आलिंगन भयो भाँवतोजीको।
जगके जीव उधारन कारन मेट्यो दोस कलीको ।
रङ्ग महलमें बजत बधाई नृत्य होत युवतीको ।
'ललितमाधुरी' तन-मन बारी भयो मनोरथ हियको । पण्डित श्यामसुन्दरजी
श्रीसरसमाधुरीजीके माध्यमसे ही मुसलमान भक्त अजमेरके श्रीसनम साहबसे उनका सम्पर्क हुआ। उनके यहाँ भी राधाष्टमीके उत्सवपर वे अक्सर जाया करतीं। एक बार जब उनकी आयु लगभग ७० वर्षकी थी. वे अजमेरसे कुछ भक्तोंके साथ श्रीनाथद्वारे गयीं। वे वे और उनके साथी मन्दिर मन्दिरके पट बन्द थे। सब बाहर दालानमें बैठकर पट खुलनेकी प्रतीक्षा करने लगे। मन्दिर पहुँचे चार बजेके लगभग, जब उस समय ललिताजीको आठ-दस बालकोंके साथ दालानमें धमाचौकडी मचाते नील और गौर वर्णके दो अति सुन्दर बालकोंके दर्शन हुए और वे मूर्छित हो गयीं।
कुछ देर बाद जब चेतना आयी मन्दिरके पट खुल चुके थे। भीतर जाकर उन्होंने श्रीनाथजीके दर्शन किये। वे दर्शन कर रही थीं उसी समय एक बालकने पीछेसे आकर उनके कन्धेपर हाथ रखते हुए कहा- 'देख, मैं कितना सुन्दर हूँ! उन्होंने गर्दन मोडी तो देखा कि वही नील वर्णका सुन्दर बालक, जिसे उन्होंने थोडी हेर पहले बालकोंके साथ उछल-कूद करते देखा था, उनके पीछे खड़ा मुस्कुरा रहा है। वह सचमुच बहुत सुन्दर था ! उसे देख जैसे ही ललिताजीने हाथ बढ़ाया उसे पकडनेको, वह अन्तर्धान हो गया। ललिताजी फिर मुमूर्छित हो गयीं।
राधा-कृष्ण और उनके परिकरोंकी इस प्रकारकी लुका-छिपी ललिताजीके साथ और बहुत दिनों तक होती रही। चौरासी वर्षकी अवस्थामें इसका अन्त हुआ, जब वे अपना पार्थिव शरीर वृन्दावनकी रजमें छोड़कर नित्य-निकुञ्जमें उनकी नित्य-सेवामें चली गयीं।
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
भक्तिमती श्रीललिताबाईजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।