ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 15

भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी

भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी
भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी — ब्रज के भक्त भाग 2

भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।

जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन

[ वृन्दावन ]

लाहौर के सालमीगेट बाजारकी घटना है। एक वृद्धा किसी कपड़ेकी दुकानपर कपड़ा देख रही थी। एक बालक उसके साथ था। दुकानदारने तरह-तरहके रेशमी नोंके ढेर उसके सामने लगा रखे थे। अचानक उसकी दृष्टि पड़ी एक वेश्यापर, दो साड़ी और बुरका पहने ताँगेमें घर जा रही थी। उसे देखते ही एक मधुर कल्पना बिजली-सी कौंध गयी उसके मनमें और एक मधुर स्मित खेल गयी उसके अधरोंपर। विस्फारित नेत्रोंसे वह कुछ देर उस वेश्याको ऊपरसे नीचे तक देखती हाँ। फिर पास बैठे बालकी पीठपर हाथ मारकर बोली- 'नन्दलाल, झट एक नांगा तो कर ला।'

नन्दलाल भागा गया और ताँगा ले आया। वृद्धा उसके साथ ताँगेपर बैठ गयी। सीवालेसे बोली- 'वह जो ताँगा आगे जा रहा है, उसके पीछे पीछे ले चल।'

दुकानदार भौंचक्का-सा देखता रह गया। उसे लगा कि वृद्धाको कोई प्राणोंकी स्लोवनी दीख गयी, जिसे देखते ही वह सुध-बुध खो एकदम उसके पीछे भाग डो।

कुछ दूर जा वह ताँगेसे उतरी और वेश्याके पीछे-पीछे चूनमण्डीमें उसके स्टेपर चढ़ गयी। उसे देख वेश्या अचंभित ! झाड़-फानूस, कालीन, मसनद और कियोंसे सजे उस कमरेमें वृद्धाको एक गलीचेपर आदरपूर्वक बिठाकर उसने -'माँ, आप कहाँसे आयी हैं ? मैं आपकी क्या खिदमत कर सकती हूँ ?

वृद्धाने कहा- 'मैं वृन्दावन रहती हूँ। मेरी एक बहू है। उसके लिए दुकानपर बड़ा देख रही थी। सहसा मेरी दृष्टि पड़ी आपकी इस साड़ी और बुरकेपर। बस मैं वं तक खिंची चली आयी। मैंने सोचा आपसे पूहूँ यह कपड़े कहाँसे खरीदे,

जिससे मैं भी ऐसे ही कपडे लेकर बहूका लहँगा और फरिया बनवाऊँ। बड़ी शौकीन है मेरी बहू। कैसी सुन्दर लगेगी वह इन कपड़ोंमें!'

'आपकी बहू बड़ी खुशनसीब है माँ. जिसे उसकी सास इतना प्यार करती है। क्या नाम है उसका ? कहाँकी बेटी है ?

'उसका नाम राधा है। बरसानेके राजा वृषभानुकी वह बेटी है।'

वेश्याने कौतूहलवश आँखें चमकाते हुए पूछा- 'और आपके खुशनसीब साहबजादेका क्या नाम है ?' ना किस

'उसे लोग कन्हैया कहते हैं' पर मैंने उसका नाम आनंदवल्लभ रखा है।'

तब वेश्याने हँसकर कहा- 'अच्छा! मैं समझ गयी। तब तो वह मेरी भाभी हई माँ। उसके लिए कपडे मैं मँगा दूँगी। यह कपडे यहाँ नहीं मिलते। मुझे अमृतसरके मेरे प्रेमी एक कपड़ेके व्यापरीने दिये थे।'

'तो आप मुझसे पैसे लेकर एक-एक थान दोनोंका मँगा दें।'

'पैसोंका हिसाब पीछे हो जायगा, माँ। मैं आपको कपड़े वृन्दावन पहुँचा दूँगी। आप मुझे अपना पता बता दें।'

'मेरा पता है-आनन्दीबाई, श्रीराधा-आनन्दवल्लभजीका मन्दिर, राधावल्लभघेरा, वृन्दावन।'

आनन्दीबाईके वृन्दावन पहुँचनेके कुछ ही दिन बाद बिल्टीके साथ अमृतसरके व्यापारीकी चिट्ठी आयी, जिसमें लिखा था- 'आपकी बहू और लालाके लिए आपकी पसन्दके दो थान भेज रहा हूँ। इन्हें मेरी ओरसे उन्हें भेंट करनेकी कृपा करें।'

आनन्दीबाई उस कश्मीरी ब्राह्मण परिवारकी एक परमतेजोमयी महिला थी, जो परम्परासे पं मोतीलाल नेहरू और उनके पूर्वजोंकी पुरोहिताई करता आ रहा था। उनका जन्म सम्वत् १९१२, कार्तिक सुदी पञ्चमीको हुआ था। उनके पिता अमृतसरमें सिटी इन्सपेक्टर थे। आरम्भसे ही उनका भगवत्-सेवा और सधु-सेवाने बड़ा अनुराग था। उनकी सगाई हई, तभी उनके होनेवाले पतिका देहान्त हो गया। उन्होंने तब माँसे कहा- 'भगवान्ने कृपाकर यह संकेत किया है कि मेरा जन्म उनकी सेवाके लिए है, जन्मने मरनेवाले मनुष्यकी सेवाके लिए नहीं। मैं अब विवाह नहीं करूँगी।' माता-पिता और गुरुजनोंके बहुत समझानेपर भी वे अपने संकल्पपर दृढ़ रही।

उन्होंने जगराबाँके रामानुज सम्प्रदायके आचार्य श्रीवंशीधरजी महाराजसे दीक्षा जी और विधिवत् भजन करने लगीं। रामानुज सम्प्रदायमें दीक्षित होते हुए भी उनकी राधा-कृष्णमें विशेष निष्ठा थी। उन्होंने पिताजीसे प्रार्थना की एक मन्दिर बनवाकर उसमें राधा-कृष्णकी मूर्तियाँ पधराने की, जिससे उन्हें उनकी नित्य आत्मवत् सेवा करनेका सौभाग्य प्राप्त होता रहे। पिताने फैब्यारेवाले चौकमें घी-मण्डीके दरवाजेके पास अपने मकानमें ही एक मन्दिरका निर्माण किया। उसमें श्रीराधा-आनन्दवल्लभजीकी मूर्तियोंकी प्रतिष्ठा की। आनन्दीबाई प्रेमसे उनकी सेवा करने लगीं। उनका नित्य नया श्रृंगार करतीं, नये-नये व्यञ्जनोंका उन्हें भोग लगाती, उन्होंकी सेवा-पूजामें सदा संलग्न रहतीं।

कुछ दिन बाद उनके माता-पिताका देहान्त हो गया। गुरुदेव भी नित्यधाम पधार गये। तब वे तीर्थ-यात्राको निकलीं। श्रीराधा-आनन्दवल्लभको अपनी बहनके पास आगरेमें छोड़ कुछ दिन तीर्थोमें भ्रमण करती रहीं। फिर कुछ दिन काम्यवन रहकर वृन्दावन पधारीं। वि० सम्वत् १९६३ में राधावल्लभजीके घेरेमें भूमि खरीदकर मन्दिरका निर्माण किया। श्रीराधाआनन्दवल्लभजीको उसमें विराजमान करा स्थायी रूपसे वृन्दावन रहने लगीं।

श्रीराधाआनन्दवल्लभजीके प्रति आनन्दीबाईका वात्सल्य भाव था। आनन्दवल्लभजी उनके पुत्र थे, राधा पुत्रवधू। दोनों बड़े रसिक थे। आनन्दीबाई अकी रसिकतासे विमुग्ध थीं और निकटस्थ श्रीराधावल्लभजीके मन्दिरकी परिपाटीके अनुसार उनकी आत्मवत् सेवाकर आत्मविभोर रहती थीं।

सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ

आज आनन्दवल्लभजीको हलुआ चाहिये, आज खीर, आज मालपुआ, कलाकन्द या बालूसाई। आज वे राजा बनेंगे, आज ग्वारियेका वेश धारण कर गायें बराने जायेंगे, आज नाग नाथेंगे, रास करेंगे या जलकेलि। उनकी वेशभूषा और साज-सज्जा आज सब उसके अनुरूप ही होगी। आज वे अमुक गायकका गान सुननेको मचल रहे हैं तो आज अमुक वादका वाद्य सुननेका हठ कर रहे हैं। आज राधा मचल रही हैं कि वे पहनेंगी तो नयी साडी पहनेंगी, नहीं तो पहनेंगी ही नहीं। आज उनका फूलोंके शृंगारका मन है, तो आज जल-विहार या नौका विहारका। आनन्दीबाई बड़े प्रेमसे दोनोंके नाज-नखरे उठातीं। दोनोंकी नित्य नये-नये साज-श्रृंगारमें नयी-नयी छवि देख अपने कोटि-कोटि प्राण उनपर न्यौछावर करतीं। अके समकालीन रसिक सन्त श्रीरूपमाधुरीशरणजीने उनके सम्बन्धमें यह कवित्त लिखा है-

भक्त आनन्दीबाई, रसकिन सुखदाई,

श्यामा-श्यामने पठाई सेवा-सुख सरसानको ।

लाल ललीको लडावे, बहू भाँति-सों झुलावे, खेल होरोको खिलावे, वारे तन-मन-प्रानको ।।

जाके नेक नहिं मान, हिये दीनता प्रधान, बानी प्रेम-रसखान, नसा प्रेमकी छकानको ।

छवि श्यामाजूकी एक, प्रान वारै देख-देख, जाकी महिमा अलेख, हिय धरि लेऊ ध्यानको ।।

(श्रीरूपमाधुरी शरणजीकी वाणी, ३-४)

आनन्दीबाईके मन्दिरकी सेवा-परिपाटी और उनके ठाकुरकी नित्य नयी मधुरिमाकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। वृन्दावनके दर्शनीय मन्दिरोंमें उसकी गणना की जाने लगी। दूर-दूरसे दर्शनार्थी दर्शनको आने लगे। एक बार पण्डित मोतीलाल नेहरू और उनकी पत्नी आये और श्रीआनन्दवल्लभजीको एक सुन्दर मोतियोंको माला भेंट कर गये। उस दिन उस मालाके साथ श्रीआनन्दवल्लभकी अपूर्व शोभा निहार आनन्दीबाईके आनन्दका छोर न रहा।

एक दिन जब एक दर्शनार्थी दर्शन करके जाने लगा, आनन्दीबाईने नन्दलालसे* कहा- 'तू इनके पीछे-पीछे जा। देख ये कहाँ जाते हैं, पर यदि ये तुझे देख लें और लौटनेको कहें तो वहींसे लौट आना।' नन्दलालजी उनके पीछे-पीछे गये। मोतीझीलके पास उन्होंने मुड़कर उनकी ओर देखा और लौट जानेको कहा। जब वे लौटकर आये; आनन्दीबाईने पूछा- 'तूने क्या उनमें कोई विशेषता देखी ?'

नन्दलालजीने कहा- 'देखी, उनकी परछाईं पृथ्वीपर नहीं पड़ती थी और आँखोंकी पलकें नहीं झपती थीं।'

आनन्दीबाईने कहा- 'वे इच्छाधारी थे। इच्छानुरूप शरीर धारण करनेकी सामर्थ्य रखते थे।' इस प्रकार न जाने कौन-कौन किस रूपमें आनन्दवल्लभजीके दर्शन करने आया करते।

* नन्दलालजी बाल्यावस्थामें अपने पिताके साथ अमृतसरमें आनन्दीबाईके मन्दिरमें कीर्तनमें जाया करते थे। तभीसे आनन्दीबाईका उनपर वात्सल्य-भाव था और वे

अधिकतर उनके साथ ही रहा करते थे।

आनन्दबल्लभजीकी सेवामें आनन्दीबाईके अन्तरंग सहायक थे रसिक सन्त श्रीकिशोरीदास बाबा (सिद्ध श्रीनित्याशरणनन्दजी अवधूत)। वे युवावस्थामें ही उनके सम्पर्क में आ गये थे। आनन्दवल्लभजीके बाद उन्हींको वे अपना दूसरा पुत्र मानती थीं। वे आनन्दीबाईके मन्दिरके निकट दाऊजीके मन्दिर में रहते थे। पाकविद्या और फूल-सेवामें बड़े निपुण थे। आनन्दवल्लभजीकी रसोई और उनकी फूल-सेवाका काम अधिकतर वे ही करते थे।

एक दिन उन्होंने आकर देखा कि आनन्दीबाई मन्दिरके बाहर बैठी रो रही हैं। उन्होंने पूछा- 'माँ, क्या बात है? क्यों दुःखी हो रही हैं ?'

वे बोलीं- 'क्या करूँ बेटा ? आज लाली बडी मचल रही है। कल बुत्रू-मुंशीकी दुकानपर साडी देखने गयी थी। एक साड़ी बहुत कीमती थी। उसे छोड़ आयी, दूसरी ले आयी। उसे नहीं पहिन रही है। जितनी बार पहनाती हूँ उतार देती

है। कहती है- 'मैं तो वही साड़ी पहनूँगी, जिसे तू छोड़ आयी है।' 'तो इसमें दुःखी होनेकी क्या बात है माँ, मैं जाकर वही साड़ी लिये आता हूँ।'

किशोरीदास बाबा गये और बुन्नूमुंशीकी दुकानसे वह साड़ी ले आये।

पैसे सेठ हरगूलालजीके नाम लिखा आये। माँने राधारानीको साड़ी पहनायी। उन्होंने झट बड़े कलात्मक ढंगसे पहन ली। माँ और दर्शनार्थी देखकर बहुत प्रसत्र हुए।

सेठ हरगूलालजी आनन्दीबाईकी बहुत सेवा किया करते। उन्होंने दुकानदारोंसे यह कह रखा था- आनन्दीबाईको जिस चीज की जरूरत हो मेरे नामपर दे दिया करो। आनन्दीबाई आनन्दवल्लभको जब जिस चीजकी जरूरत होती उनके नामसे उधार ले आतीं और पीछे कर्ज चुकाती रहतीं।

आनन्दीबाईपर कर्ज इसलिए रहता कि उनके खर्चेकी कोई सीमा न थी। श्रीराधा-आनन्दवल्लभकी सेवाके अतिरिक्त सन्त-सेवा भी वे नित्य प्रेमसे किया करतीं। १०-१५ सन्त तो नित्य उनके स्थानपर प्रसाद पाया ही करते। उनका दरवाजा सन्तोंके लिए सदा खुला रहता। जो जिस समय आ जाता उसी समय उसके लिए प्रसादकी व्यवस्थाकी जाती। उनके मंदिरके निकट राधावल्लभजीका प्राचीन मन्दिर है. जिसके खाली पडे विशाल कक्षमें साधु-सन्त प्रायः रात्रिमें आकर विश्राम करते हैं। आनंदीबाई नित्य रात्रिमें अपने मन्दिरका दरवाजा बन्द करनेके पूर्व

भक्तों के साथ मिलन और सत्संग

उस मन्दिरका चक्कर लगातीं। यदि वहाँ कोई भूखा साधु या भिखमंगा पड़ा होता. तो उसे खिलाये बगैर स्वयं प्रसाद ग्रहण न करतीं।

छोटेलालाजी और बडेलालाजी नामके मथुराके प्रसिद्ध सितारिये और टटिया स्थानके आनन्दवल्लभजीके दरबार में गायकों और वादकोंका समाज जुटा रहता। बाबा कुञ्जबिहारीदासजी जैसे प्रसिद्ध समाज गायक अपनी-अपनी कलाओगे श्रीराधा-आनन्दवल्लभका मनोरंजन किया करते। आनन्दीबाई उनकी भी पर्याप्त सेवा करतीं। आनन्दवल्लभजीके कीमती-से-कीमती शाल-दुशाले उपहारमें उन्हें देनेमें तनिक भी संकोच न करतीं।

रासलीलासे भी आनन्दीबाईको बहुत प्रेम था। उन्होंने रासलीलाके लिए एक कीमती पोशाकें, मोर-मुकुट और उनकी साज-सज्जाकी अन्य सामग्री रखी रहती। बड़ा हॉल मन्दिरके ऊपर बनवा रखा था। उसमें रासधारियोंके लिए कीमती-से-

रासलीलाकी अच्छी-से-अच्छी मण्डलियोंका रास वहाँ हुआ करता।

भक्तको प्रेरणा देकर कर्ज चुकानेकी व्यवस्था कर दिया करते। कर्ज चुकाने के लिए यह सारा काम कर्जसे चला करता। आनन्दवल्लभजी किसी-न-किसी धन एकत्र करनेके उद्देश्यसे आनन्दीबाईको अमृतसर और लाहौर आदि स्थानोंकी भी कभी-कभी यात्रा करनी पड़ती।

पर, आनन्दवल्लभजीको आनन्दीबाईका उन्हें छोड़कर कहीं जाना अच्छा न

लगता। वे किसी-न-किसी बहाने उन्हें शीघ्र लौट आनेको विवश कर देते। एक बार वे हरिद्वार गयी हुई थीं। आनन्दवल्लभजीने स्वप्नमें उनसे कहा- 'माँ, पुजारी हलवेका भोग नहीं लगाता। तुम शीघ्र लौट आओ।' वे उसी दिन हरिद्वारसे लौट आयीं। आकर मालूम हुआ कि सचमुच पुजारीने कई दिन प्रातः हलवेका भोग नहीं लगाया।

हलवेके आनन्दवल्लभजी बड़े-शौकीन थे। कभी-कभी रात २ बजे माँसे कहते- 'माँ, बड़ी भूख लगी है। उठ, हलवा बना दे।' माँ उसी समय उठतीं और नहा-धोकर उनके लिए हलवा बनातीं।

वे अपने ठाकुरकी सारी सेवा स्वयं ही करतीं। केवल बाबा किशोरीदासजी उनकी सहायता किया करते। पर सन्त-सेवाके कारण उन्हें ठाकुर-सेवाके लिए कभी-कभी अवकाश न मिल पाता। इसलिए, वे मन्दिरमें एक पुजारी भी रखतीं। पुजारीसे जब भोग में चूक हो जाती तो आनन्दवल्लभजी माँसे शिकायत करनेमें न चूकते। एक बार जाडेके दिनोंमें पुजारीने ठाकुरको शयन कराया, पर वह रजाई

रजाई उढ़ा दो।' माँ उसी समय शैय्यासे उठीं। स्नानादि कर मन्दिरमें गयीं तो उन्हें उढ़ाना भूल गया। आनन्दवल्लभजीने माँसे कहा- 'माँ बडी ठण्ड लग रही है. देखकर दुःख हुआ कि सचमुच पुजारीने रजाई नहीं उढाई थी।

क्या आनन्दवल्लभजी स्वयं रजाई नहीं ओढ सकते थे ? माँको सोतेसे जगानेकी ऐसी क्या आवश्यकता थी उन्हें ? ओढ सकते थे; पर माँके, लाडले बेटे थे न! उन्हें माँके हाथसे रजाई ओढने में सुख मिलता था, और माँको अपने हाथसे उन्हें उढानेमें। तब वे अपने हाथसे ओढनेका कष्ट क्यों करते ? उनका तो आविर्भाव ही अर्चा-विग्रहके रूपमें हुआ था माँकी प्रेम-सेवा अंगीकार कर उन्हें सुखी करने और स्वयं सुखी होनेके उद्देश्यसे। इस रूपमें उन्हें माँकी प्रेम-सेवा-सुखका आस्वादन करनेकी जितनी सुविधा थी, उतनी क्या और किसी रूपमें सम्भव थी ? माँ पौढाए तो पौढे माँ उढ़ाए तो ओढे, माँ जगाए तो जागें, माँ ही नहलाए तो नहाये-धोये और माँ ही खिलाए तो खाये-पिये।

पर, केवल माँ ही बेटा-बहूके लिए सब कुछ करती रही हों और बेटा-बहू उनके लिए कुछ न करते रहे हों, सो नहीं। बेटा-बहू भी आवश्यकता पड़नेपर वैसे ही उनकी सेवाके लिए प्रस्तुत रहते। एक बार वे आठ दिन तक बीमार मन्दिरके ऊपरवाले कमरेमें पड़ी रहीं। लोगोंने सुना माँको कहते- 'बेटा, तुम दोनों ऊपर क्यों आ गये। मुझे छुओ नहीं। देखो मैं आठ दिनसे नहाई नहीं हूँ।' उस समय कमरेमें और कोई नहीं था, लोग समझे माँ बाइमें वक रही हैं। पर, उसी दिन वे स्वस्थ हो गयीं और नहा-धोकर ठाकुर-सेवा करने लगीं। तब वे समझे कि राधाआनन्दवल्लभ अवश्य ऊपर गये थे और माँको स्पर्श किया था। तभी वे एकदम स्वस्थ हो गयीं।

संवत् १९९३, अगहन सुदी १५ को आनन्दीबाईने नित्य-धाममें प्रवेश किया। संवाद पाते ही सारा वृन्दावन उमड़ पड़ा। अपार जन-समूहकी कीर्तन-ध्वनिके साथ उनके पार्थिव शरीरको यमुना-तटपर ले जाया गया। उन्हें मुखाग्नि कौन दे ? इसपर विचार हो रहा था। उसी समय एक कन्या सामने आयी और बोली- 'मैं इनके कुनबेकी हूँ, मुखाग्नि मैं दूँगी।'

उसने अग्नि दी। उसके कुछ ही पल बाद फिर वह किसीको न दीखी। कई दिनों तक भक्तोंमें चरचा होती रही - 'कौन थी वह कन्या, जिसने मुखाग्नि दी ? कहाँसे आयी थी ? कहाँ चली गयी ?'

प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश

ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।

कथा का सार

भक्तिमती श्रीआनन्दीबाईजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।