ब्रज के भक्त भाग 2 · अध्याय 20
बदामके एक सिद्ध बाबा और पण्डित श्रीजगदानन्ददास बाबाजी
बदामके एक सिद्ध बाबा और पण्डित श्रीजगदानन्ददास बाबाजी की प्रेरक हिंदी कथा। जानिए उनके जीवन, भक्ति और साधना से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग।

बदामके एक सिद्ध बाबा और पण्डित श्रीजगदानन्ददास बाबाजी का यह भक्त-चरित्र ब्रज की साधना, श्रद्धा और जीवन से जुड़े प्रसंगों को सामने लाता है। नीचे कथा को अलग-अलग विषयों में व्यवस्थित किया गया है।
सेवा, प्रसाद और समर्पण की घटनाएँ
नन्दग्रामळे एक सिद्ध वाटा
। नन्दग्राम ।
जिस समय काम्यवनमें सिद्ध श्रीजयकृष्णदास बाबा और कोसीमें सिद्ध बीष्णवदास बाबा भजन करते थे, उस समय नन्दग्राममें पौर्णमासी कुण्डक तीरपर एक वृक्षके नीचे एक सिद्ध बाबा रहते थे। वे गोवर्धन शिलाकी सेवा करते थे। शेवर्धनशिला एक कपडेमें बाँध कण्ठसे लगाकर रखते थे। मल-मूत्र त्याग करते समय या स्नानादि करते समय भी गिरिराजजी उनके कण्ठसे हो लगे रहते थे।
भजनावेशमें कभी-कभी वे दो-तीन दिन तक लगातार अंतर्दशाविष्ट रहते थे। उस समय उन्हें कुछ भी बाह्यज्ञान नहीं रहता था। उस समय मल-मूत्र त्याग, स्नान और आहारादि भी नहीं होता था। बाह्यज्ञान होनेपर वे स्नानादिकर सेवा और अहिकादि करते थे। उनके निकट उनके अनुगत जो वैष्णव रहते थे। वे पाक काते थे और बाबा गिरिराजजीका भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे।
आहारकी सामग्री कहाँसे आती थी कोई नहीं जानता था। भोग इतने परिमाणमें साता था कि जो वैष्णव वहाँ जाते थे, वे भी प्रसाद ग्रहण करते थे। उन्हें स्वतन्त्र सबसे प्रसादके लिए चेष्टा नहीं करनी पड़ती थी।
व्रजभूमि और तीर्थ से जुड़ी घटनाएँ
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पण्डित श्रीजगदानन्ददास बाबाजी
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श्रीजगदानन्ददास बाबा काम्यवनके सिद्ध जयकृष्णदास बाबा और गोवर्धनके बद्ध श्रीकृष्णदास बाबाके समकालीन थे। सम्भवतः बंगालके फरीदपुर जिलेका नका जन्म था। इसी जिलेके रामदीया ग्रामके अखाड़ेके महन्त श्रीभगवानदास बबाजीसे देश ग्रहणकर वे १८-१९ वर्षकी अवस्थामें ही वृन्दावन चले आये थे। जाने कब, कहाँ और किससे विद्याध्ययन किया, कुछ पता नहीं। पर यह सच है कि वे बहुत बड़े विद्वान थे। उस समय गौडीय-वैष्णव सम्प्रदायनें उनके जोड़का दूसरा पण्डित नहीं था। बहुत से लोगोंने उनसे शास्त्र अध्ययन किया। श्रीनरोत्तम
१ यह वृत्तान्त भी श्रीअद्वैतदास पण्डित बाबाजीने श्रीहरिदासको सुनाया था।
ठाकुर महाशय द्वारा लोगोंने उनसे शास्त्र अध्ययन किया। श्रीनरोत्तम ठाकुर महारा द्वारा आविष्कृत गराणहाटी-कीर्तनके उस समयके अद्वितीय गायक और हरिनाम मृत-व्याकारणके अध्यापक श्रीअद्वैतदास पण्डित बावाजी भी उन्हींक शिष्य थे।
श्रीमधुसूदनदास बाबासे बड़ा सौहार्द था। श्रीकृष्णदास बाबासे उनका प्रेम कल उनका श्रीजयकृष्णदास बाबा, श्रीकृष्णदास बाबा और सूर्यकुण्ड अकसर हुआ करता था।
दिव्य अनुभूति और कृपा के प्रसंग
वे बडे धाम-निष्ठ सन्त थे। धामने एक बार बड़े विचित्र ढङ्गसे उन्हें अपनी महिमाका दिग्दर्शन कराया था। वे उस समय राधाकुण्ड रहते थे। एक दिन सन्या समय वे सूर्यकुण्डके लिए चल पडे। सूर्यकुंड राधाकुण्डसे ३-४ मील उत्तरमें है। कुछ एक घण्टेका रास्ता है, पर उनके सूर्यकुण्ड पहुँचते-पहुँचते सबेरा हो गया। वे न रास्ते में कहीं रुके, न रास्ता भूले। उन्हें देख मधुसूदनदास बाबाने कहा- 'इतना सबेरे कहाँसे चले आ रहे हैं ?
सबेरे ? क्या सबेरा हो गया ? मैं अभी सन्ध्या समय तो राधाकुण्डसे चल हूँ!" जगदानन्ददास बाबाने आश्चर्यसे चारों ओर देखते हुए कहा।
मधुसूदनदास बाबा बोले- 'आपको धामने कृपाकर अपनी कमलकी-ससे संकोच और विकासकी शक्तिका परिचय दिया है। आपतो शास्त्रज्ञ हैं। जानते ही है। कि धाममें देश और काल लीला-शक्तिके अधीन है और लीलाके प्रयोजनके अनुसार संकोच और विकासको प्राप्त होते रहते हैं।'
प्रेम और भक्ति — जीवन-संदेश
ईश्वर-प्रेम की अनुभूति भक्त-साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय है। इन प्रसंगों को श्रद्धा, संवेदनशीलता और समर्पण के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है।
कथा का सार
बदामके एक सिद्ध बाबा और पण्डित श्रीजगदानन्ददास बाबाजी की कथा भक्ति, विनम्रता और साधना पर मनन करने का अवसर देती है। इस संग्रह में अन्य भक्तों के जीवन-प्रसंग भी पढ़ें।